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क़ुरआन में कोविद-19 जैसी महामारी का संभावित उल्लेख

Corona in Quran

डॉ. अब्दुल रशीद अगवान

आमतौर पर मुसलमान यह मानते हैं कि क़ुरआन चिरस्थायी मार्गदर्शन का ग्रंथ है। तदनुसार, इसके सिद्धांत, आदेश और मान्यताएं उसके अवतरण के देशकाल से परे होनी चाहिए। अर्थात, सैद्धांतिक रूप से दुनिया के अंतिम दिन तक इसका मार्गदर्शन संभव होना चाहिए। इस ग्रंथ की कई आयतों को इतिहास की बाद की घटनाओं के संदर्भ में समझा जाता है, जैसे कि सूरह रूम (30:1-3) में ईरान से रोम की हार के बाद रोम की जीत का उल्लेख जो कि इस सूरह के अवतरण के क़रीब 10 साल बाद क़ुरआन की भविष्यवाणी के अनुसार हुआ। इसी सूरह (30:41) में वर्तमान वैश्विक पर्यावरण संकट का एक संक्षिप्त उल्लेख भी मौजूद है, ऐसा क़ुरआन की कुछ आधुनिक व्याख्याओं में बताया गया है। इस पवित्र पुस्तक में कई रहस्यमय शब्दों को सामने रख कर कुछ ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर गोग और मेगोग (याजूज-माजूज) का अस्तित्व (18:94, 21:96) यानी वे कौन हैं और ज़ूल-क़र्नैन की कहानी की विभिन्न व्याख्याएं की जाती रही हैं। कई आयतों पर विद्वानों द्वारा भविष्य के ऐतिहासिक घटनाक्रमों के रूप में चर्चा की गई है, जिसमें संसार के अंतकाल की घटनाएं भी शामिल हैं। कहने का अर्थ यह है कि क़ुरआन की व्याख्याओं में भविष्य की घटनाओं पर अनुसंधान, विचार-विमर्ष और बहसें इस्लामी परंपरा का हिस्सा रही हैं। इसी के मद्देनज़र, यह एक दिलचस्प अनुसंधान हो सकता है कि क्या क़ुरआन में नोवेल कोरोनवायरस का इतिहास की एक अभूतपूर्व आपदा के रूप में कोई ज़िक्र मौजूद है या नहीं?

अब तक, मुस्लिम टीकाकारों ने तीन या चार दृष्टिकोणों से इस महामारी पर चर्चा की है। सबसे पहले, वे लॉकडाउन, शारीरिक दूरी, साबुन से हाथ धोने, मास्क का उपयोग, अल्कोहल से घरों और इबादतगाहों को सेनीटाइज़ करने, धार्मिक स्थलों के बजाए घर में इबादत, महामारी के दौरान रमज़ान और ईद-अल-फितर को घर पर मनाने, संक्रमित लाशों के लिए दफन के मानदंडों, आदि के बारे में इस्लाम की शिक्षाओं को लेकर सामने आये हैं। कुछ ने ‘इस्लामी’ दवाओं, आस्थावनों की नैतिक स्थिति और इसी तरह की कई प्रासंगिक इस्लामी शिक्षाओं को याद किया है। इस मुद्दे पर लिखे जा रहे लेखन का एक और दृश्य यह है कि इसे एक दैवीय विपत्ति माना गया जो कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में मुसलमानों पर हुए अत्याचार करने वाले कुछ राष्ट्रों को दंडित करने के लिए प्रकट हुई, हालांकि यह विचार बड़ी संख्या में मुस्लिम देशों में भी इस वायरस के संक्रमण के बाद मांद पड़ गया। इस बात पर भी बहस छिड़ी कि कोरोनावायरस मुसलमानों को प्रभावित नहीं करेगा क्योंकि वे अल्लाह के आदेश का पालन करते हैं और दिन में पांच बार खुद को साफ करते हैं। धार्मिक मुसलमान आमतौर पर यह सोचते थे कि वे मस्जिदों में सुरक्षित रहेंगे, विशेष रूप से मक्का और मदीना के पवित्र शहरों में। मगर हालात ने उन्हें इन विचारों को बदलने पर मजबूर कर दिया। कुछ लेखकों ने यह भी निष्कर्ष निकाला है कि कोविद-19 की महामारी संसार के अंतकाल के संकेतों से मेल नहीं खाती है जैसा कि हदीसों के हवाले से उल्लेख किया जाता है और इसे अंतकाल की एक गंभीर घटना के रूप में नहीं माना जा सकता है। इन बहसों के बीच, इस बात की शायद ही कोई चर्चा हुई है कि क़ुरआन में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस महामारी या इसी तरह की किसी और महामारी का उल्लेख है या नहीं? क़ुरआन के 74 वें अध्याय, यानी सूरह अल-मुद्दस्सिर, के गहरे अध्ययन से इस संबंध में शायद कुछ संकेत मिल सकें।

यहां यह याद रखना ज़रूरी कि क़ुरआन की कई आयतों के अर्थ को आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, न्यायिक, भाषाई और वैज्ञानिक सहित कई पहलुओं से समझा जाता है। यद्यपि किसी भी आयत के सामान्य अर्थ को क्लासिकल तरीक़े से विद्वानों द्वारा लिया जा सकता है, मगर उसी आयत की कोई वैज्ञानिक व्याख्या उसके बारे में अतिरिक्त जानकारी प्रदान कर सकती है या उसका कोई गहरा अर्थ सामने ला सकती है; उदाहरण के लिए मानव भ्रूण के बारे में क़ुरआन के बयान को लिया जा सकता है। क़ुरआन के 74 वें अध्याय की कुछ आयतों पर विचार करने से कोविद-19 जैसी महामारी के बारे में इशारा मिल सकता है।

सूरह मुद्दस्सिर का अवतरण दो बार में हुआ। इसकी पहली 7 आयतों का अवतरण इक़रा शब्द से शुरू होने वाली सूरह अलक़ की पहली 5 आयतों के कुछ साल बाद क़ुरआन के अवतरण की दूसरी घटना के रूप में हुआ। क़ुरआन के अवतरण की पहली घटना के बाद 2-3 वर्षों तक एक विराम था जो सूरह मुद्दस्सिर के पहले भाग के अवतरण के साथ समाप्त हुआ। इसके दूसरे भाग की बाक़ी की 49 आयतों के बारे में माना जाता है कि उनका अवतरण कुछ साल बाद, आने वाले हज के अवसर पर पैग़म्बर साहब के मिशन का विरोध करने के लिए मक्का के सरदारों के फैसले पर अल्लाह की टिप्पणी के रूप में हुआ। इस सूरह में कुछ ऐसे शब्द हैं जो कि उनके गूढ़ अर्थ की किसी भी वैज्ञानिक व्याख्या के लिए एक गंभीर सोच पर उभारते हैं, जो शायद वर्तमान महामारी से इस सूरह का संबंध जोड़ते हैं। इनमें मुद्दस्सिर (कपड़ों के कवच से ढका), सियाब (पहनने के कपड़े), रूजज़ (अस्वच्छता), अहजुर (दूर रहना), क़र्न (सींग), सऊद (विपत्ति), सक़र (जलन), तिस्अता-अशर (उन्नीस), जुनूद (फौज), आदि शामिल हैं। इस अध्याय के गूढ़ अर्थ और संदेश को समझने के लिए प्रयास करने से पहले इनमें से कुछ शब्दों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी।

कोरोना

सूरह की आयत 8 में दो शब्द ‘नुक़ीर’ और  ‘नाक़ूर’ हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे मूलशब्द ‘क़र्न’ (ق ر ن) से संबंधित हैं। इब्ने कसीर और बाद के टीकाकारों ने ‘क़रन’ को अंतकाल की तुरही (सूर) को निरूपित करने के अर्थ में लिया है और इसीलिए इस आयत का अनुवाद सही-इंटरनेशनल और अन्य में इस तरह किया गया है, “और, जब तुरही (सूर) में फूंक मारी जाएगी।” विक्शनरी.कॉम ने उल्लेख किया है कि ‘क़रन’ का प्रोटो-सेमिटिक भाषा में इस्तेमाल ‘हॉर्न’ यानी सींग को दर्शाता है जोकि प्राचीन ग्रीक भाषा के शब्द क्रोनोस (आवाज़ में कोरोना जैसा लगता है) से जुड़ा हो सकता है, जिसका अर्थ है समय या जीवन काल। अब्दुल माजिद दरियाबादी ने इसे तेज़ आवाज़ पैदा करने वाले एक यंत्र के रूप में लिया है, जो इसकी व्याख्या यूं करते हैं, “और, जब सूर की तेज़ आवाज़ होगी।” अरबी शब्दकोष इस शब्द को तेज़ आवाज़ पैदा करने वाले सींग व अन्य अर्थों के अलावा, सौ साल का समय या प्राचीन यूनानियों की तरह एक शताब्दी के अंतराल के रूप में दर्शाते हैं। शब्द ‘क़रन’ अरबी भाषा में ऐसे अर्थों को व्यक्त करता है जैसे कि बैल का जुआ, जोड़, मिलाना, फली, सहकर्मी, आदि। क़ुरआन में शब्द ‘क़र्निन’ का अर्थ पीढ़ियां भी लिया जाता है। इस शब्द के बहुवचन, ‘कुरुना’ (قُرون), की अंग्रेजी शब्द ‘कोरोना’ के साथ एक अजीब ध्वन्यात्मक समानता है। जैसे कि आगे बताया गया है, कोरोनावायरस के नाम के साथ अरबी भाषा के शब्द ‘क़रन’ या इसके बहुवचन ‘कुरुना’ की आवाज़ में ही नहीं अर्थों में भी समानताएं पाई जाती हैं।

कोरोनावायरस गेंद के आकार का एक वायरस है जिसकी सतह पर कई बल्बनुमा ढांचे पाये जाते हैं। इन बल्बनुमा प्रोजेक्शन या स्पाइक्स को इस वायरस के सींग के रूप में लिया जा सकता है। बैलगाड़ी में दो बैलों को सींग द्वारा जुए के रूप में बांधने या दो चीजों को एक साथ जोड़े जाने जैसे अन्य अर्थ वायरस की प्रवृत्ति से समझे जा सकते हैं क्योंकि वायरस मेज़बान कोशिका (सेल) में अपने स्पाइक को घुसाता है और अंदर जाकर अपने आरएनए को क़ब्ज़े वाली कोशिका के अनुवांशिक कमांड के साथ जोड़ लेता है। कोरोनावायरस एक फली के समान भी होता है जिसमें वसा की दीवार के अंदर इसकी वास्तविक जीवंत सामग्री होती है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि एक वायरल महामारी आमतौर पर हर सदी के शुरुआती भाग में, कुछ अपवादों को छोड़ कर, दिखाई देती है, जो शब्द ‘क़रन’ के एक और अर्थ को इंगित करती है, यानी एक सदी या सौ साल का समय या उसमें बार बार होने वाली घटना। यह महज़ एक संयोग नहीं हो सकता है कि अरबी शब्द ‘क़रन’ के अधिकांश ज्ञात अर्थ मानव कोरोनवायरस से मेल खाते हैं। इसके मद्देनजर, संबंधित आयत का अनुवाद, इस अनुमान के साथ कि शायद यह कोरोना वायरस के बारे में बताती है, इस प्रकार किया जा सकता है, “और, जब कोरोना तेज़ी से फैल जाएगा।” इस बारे में कुछ और मालूमात आगे दी जाएगी।

एक और बात जो यहां समझने की है, वह यह कि इस सूरह का अंदाज़ भविष्यवाणी के रूप में है, इतना अधिक कि अधिकांश विद्वान इसे अंतकाल के संकेत के रूप में लेते हैं। यदि शब्द ‘क़रन’ या इसके बहुवचन ‘कुरुना’ को समयावधि, अर्थात् शताब्दी या शताब्दियों के अर्थ में लिया जाता है, तो कुरुना की उपस्थिति को हर शताब्दी के बाद या किसी विशेष शताब्दी के दौरान होने वाली घटना के रूप में लिया जा सकता है। अध्याय की आयत 30 में ‘19 (उन्नीस)’ शब्द का उल्लेख यह स्पष्ट करता है कि यह सूरह एक ऐसी घटना की ओर इशारा कर रही है, जब ‘कुरुना’ के साथ शब्द ’19’ भी जुड़ जाएगा।

महामारियों का प्रारंभिक इतिहास अस्पष्ट है और सबसे पहले मुस्लिम अरब लेखकों ने इसके बारे में व्यवस्थित तरीक़े से लिखना शुरू किया। सूरह मुद्दस्सिर के अवतरण के एक दशक से अधिक समय के भीतर, ईरान में एक गंभीर महामारी दिखाई दी जिसे ‘शिरोय का प्लेग’ कहा जाता है। इसका सबसे गंभीर काल 627-628 बताया गया है। इसने सासानी राजा कोवाड द्वितीय की भी जान लेली और उसके साम्राज्य को तबाह कर दिया। हालांकि, रिकॉर्ड पर पहला निश्चित प्रकोप रोम का ‘जस्टिनियन का प्लेग’ (गंभीर काल 541-542) था, जिसमें लगभग 5 करोड़ लोग मारे गये, ख़ुद सम्राट जस्टिनियन गंभीर रूप से बीमार पड़ा और उसके साम्राज्य की नींव हिल गई। महामारी को लेकर पैगंबर मुहम्मद (स.) के कुछ ख़ास उपदेश, जैसे कि लॉकडाउन, अपने समय की इन दो बड़ी आपदाओं के बारे में उनके ज्ञान का परिणाम हो सकते हैं। शिरोय का प्लेग 639 ईस्वी में दूसरे ख़लीफा हज़रत उमर बिन ख़त्ताब के शासनकाल के दौरान सीरिया में फिर से उभरा। उस समय एक मुस्लिम सेना सीरिया में मौजूद थी। हज़रत उमर ने चाहा था कि वह वापस सुरक्षित लौट आये। मगर उस सेना के कमांडर हज़रत अबू उबैदा ने पैग़म्बर साहब के हवाले से कहा कि जहां प्लेग हो वहां से कोई किसी और जगह न जाए और जहां प्लेग हो वहां पर बाहर से कोई भी न जाए। उस सेना ने मदीना लौटने के बजाय सीरिया में महाबंदी को चुना और इस तरह से मदीना और दूसरे शहरों को महामारी से बचा लिया, हालांकि उसके कमांडर हज़रत अबू उबैदा सहित कई फौजी उस महामारी का शिकार हुए। 750 ईस्वी में इसकी गंभीरता के बाद कुछ समय के लिए यह प्लेग ठंडा पड़ गया। हालाँकि, इसका प्रकोप वर्ष 1218 में फिर हुआ, जो अंत में ‘ब्लैक डेथ’ आपदा (1332-1360) में बदल गया, जिससे यूरोप और मध्य एशिया में लगभग 5 करोड़ लोग मारे गये। इटली में 1629 में एक बड़ी महामारी शुरू हुई। पश्चिमी यूरोप की मध्ययुगीन प्लेग की अंतिम महामारी 1720 में शुरू हुई, जब फ्रांसीसी बंदरगाह वाले शहर मार्सिल से प्रकोप फैला। छठी शताब्दी के जस्टिनियन प्लेग की पहली महामारी और चौदहवीं शताब्दी की ब्लैक डेथ के रूप में दूसरी महामारी के बाद, जिसे “थर्ड पेंडेमिक” कहा जाता है, वह महामारी 1855 में चीनी प्रांत युन्नान में छा गई और इसने दुनिया के विभिन्न देशों में दशकों तक हंगामा बरपा किया। इस प्लेग में सबसे ज़्यादा भारत में 1.5 करोड़ लोगों की मौत हुई। उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के इस महान प्लेग की शुरुआत भारतीय उपमहाद्वीप के कुछ हिस्सों से हुई थी। डॉ. अगस्त हिर्श के अनुसार पश्चिमी भारतीय राज्य गुजरात और सिंध में 1815-21 में शुरूआत के बाद 1835-38 में राजपुताना इसके प्रसार का केंद्र था।[1] उसके बाद यह कुमाऊँ और गढ़वाल होता हुआ नेपाल और चीन तक पहुँच गया। 1950 के आसपास इसके ख़त्म होने से पहले 1920 और 1930 के दौरान मुख्य रूप से चीन और ब्रिटिश भारत में इसका ज़बरदस्त प्रकोप रहा। और, अब पिछले साल से शुरू हो कर कोविद-19 धूम मचा रहा है। सूरह मुद्दस्सिर के अवतरण के बाद वैश्विक महामारियों के इस संक्षिप्त इतिहास से, यह स्पष्ट हो जाता है कि बड़ी आपदाएं और महामारियां लगभग हर सदी में और आमतौर पर इसके दूसरे या तीसरे दशक के दौरान दिखाई देती रही हैं। क़ुरआन से पहले की सदियों में भी इस तरह की आपदाएं हर सदी में आती रही हैं। इसलिए, इस सूरह से जुड़ा शब्द ‘क़रन’ कोरोना के लिए भी माना जा सकता है, जिसका अर्थ होगा हर सदी में होने वाली घटना।

उन्नीस

एक आश्चर्यजनक कथन आयत 30 में आता है, अर्थात् “एलैहा तिस्अता अशर”, जिसका अनुवाद “उसके पर उन्नीस” होगा। इस सूरह में ‘19’ का हवाला नोवेल कोरोना वायरस के नामकरण के साथ इसके सहसंबंध के बारे में सोचने के लिए किसी को भी संकेत दे सकता है, जिसे तकनीकी रूप से ‘कोविड-19’ कहा जाता है क्योंकि इस महामारी की शुरूआत 2019 में हुई है। इससे पहले मानव कोरोना वायरसों में से किसी को भी उसकी उत्पत्ती के वर्ष से नहीं जोड़ा गया और यह अजब है कि क़ुरआन में एकमात्र यही एक आयत है जहां ‘उन्नीस’ शब्द का उल्लेख किया गया है। पिछली शताब्दी के एक प्रसिद्ध विद्वान और मिस्र-अमेरिकी जैव रसायनविद, डॉ. रशद खलीफा ने 1973 में एक सिद्धांत विकसित किया, जिसे क़ुरआन के 19 के गणितीय चमत्कार के रूप में जाना जाता है। इसमें उन्होंने पाया कि क़ुरआन के हर शब्द की कुल संख्या को 19 से विभाजित किया जा सकता है, सिवाय एक आयत के। एक भारतीय विद्वान, जमशेद अख्तर, ने इस सिद्धांत के अपने अध्ययन से यह नतीजा निकाला है कि डॉ. खलीफा ने जिस आयत को इस सिद्धांत पर खरा नहीं पाया है वही इस पहेली की कुंजी है। एक लंबे समय से, कोड-19 मुसलमानों और अन्य विद्वानों के बीच चर्चा का विषय रहा है। अपने विशेष दृष्टिकोण के कारण, डॉ. खलीफा ने संबंधित आयत का अनुवाद इस तरह किया है, “उस पर उन्नीस”, जबकि दूसरे विद्वान इसका अर्थ “उस पर वे उन्नीस” लेते हैं। डा. ख़लीफा इसे किसी चीज़ की संख्या के बजाय एक आंकड़े के उल्लेख के रूप में लेते हैं। य़ानी वे इसे एक वचन का इशारा यानी नर्क के लिए समझते हैं जबकि कुछ अन्य टिप्पणीकार इसे बहुवचन समझते हैं और मानते हैं कि यह नर्क पर तैनात 19 फरिश्तों की ओर इशारा है। कुछ अन्य इसे पिछली आयतों में वर्णित अग्नि की ओर इशारे के रूप में लेते हैं। फख़्र-अद-दीन अल-राज़ी ने अपनी क्लासिकल टिप्पणी में कई तरह की अटकलें लगाईं हैं, जिनमें कहा गया है कि उन्नीस की संख्या मनुष्यों की उन्नीस बौद्धिक ख़ूबियों को इंगित करती हैं।[2] यहां यह कहा जा सकता है कि इस आयत में 19 का अर्थ 19 फरिश्ते हैं, यही इसका एकमात्र स्पष्टीकरण नहीं हो सकता। इस मामले पर आगे भी चर्चा की जाएगी।

‘सक़र’

‘सक़र’ (سقر) शब्द का प्रयोग सूरह मुद्दस्सिर की आयत 26, 27 और 42 में किया गया है और सूरह क़मर (54:48) की एक आयत में भी इसका ज़िक्र है। आधुनिक अरबी में ‘सक़र’ शब्द के बने शब्द सिगरेट, सिगार, बिटुमिन और इसी तरह के अन्य शब्द हैं, जो कि आमतौर पर आग और जलने से संबंधित हैं। इस शब्द को इस्लामी शब्दावली में नर्क या नर्क की आग के रूप में लिया जाता है। हालांकि, उल्लिखित आयत में इसका अर्थ नर्क (जहन्नुम) जैसे जलने के स्थान को इंगित नहीं करता है, बल्कि जो कुछ वहां जलाता है या जलता है उसके बारे में बताता है। उदाहरण के लिए, आयत 54:48 में इस शब्द का उल्लेख इस तरह किया गया है, “जिस दिन उनको चेहरों के बल आग में घसीटा जाएगा और [यह कहा जाएगा कि] “सक़र के स्पर्श का स्वाद चखो।” बोलने और अर्थ में सक़र अंग्रेजी शब्द ‘स्कार’ (scar) की तरह है जिसको जलने के या अन्य निशान के रूप में लिया जाता है। इस शब्द ‘स्कार’ का मूल चौदहवीं सदी की फ्रेंच भाषा के एस्केयर (escare) से माना जाता है यानी त्वचा पर किसी चीज़ का लेप जैसे कि लेटिन में एस्करा (eschara) या यूनानी भाषा के एस्खरा (eskhara) और अरबी में मस्कारा या जलने के स्थान की पपड़ी या साहित्यक इस्तेमाल में घर को गर्म रखने वाली अग्नि की वेदी (hearth)। इसका अंग्रेजी में इस्तेमाल मध्यकाल के स्कार, यानी “दरार, कट, चीरा” से प्रभावित है।[3] अरबी शब्दकोष में ‘सक़र’ शब्द का उपयोग विभिन्न चीजों को दर्शाने के लिए किया जाता है। शायद, यह प्राचीन मिस्री या ग्रीक भाषाओं से अरबी में अपनाया गया है। 2600 ईसा पूर्व के मिस्री इतिहास के विशाल और प्राचीन क़बरस्तान को सक़्क़रा कहा जाता है। वहां कई शुरुआती पिरामिड हैं। यह एक दिलचस्प मालूमात हो सकती है कि कुछ पुरातत्वविद् यह पता लगा रहे हैं कि क्या इस क्षेत्र में प्राचीन काल में किसी महामारी में मरे शाही लोगों को जलाया गया था? इटली के शोधकर्ताओं की एक टीम ने थेब्स के आसार के पश्चिमी तट पर सक़्क़रा के दक्षिणी इलाक़े में हर्वा नाम का स्मारक बताया है जो कि 7 वीं शताब्दी ईसा पूर्व की किसी महामारी के दौरान वहां लाशों के निपटान के स्थान के रूप में इस्तेमाल किया गया था। इस स्थान को 250-271 ईस्वी के प्रकोप के दौरान शवों को जलाने के लिए भी इस्तेमाल किया गया था। इस ‘साइप्रियन प्लेग’ ने रोम और मिस्र में हजारों लोगों की जानें ले लीं और रोमन साम्राज्य को काफी हद तक कमजोर कर दिया।[4] यह संभव है कि ‘सक़्क़रा’ शब्द प्राचीन काल में लाशों को दफनाने की प्रचलित फिरऔनी संस्कृति के बजाए संक्रमण के डर से शवों को जलाकर निपटाने के लिए प्रचलित हो कर हम तक पहुंचा हो। कोविद-19 के मामले में भी देखा गया है कि संक्रमण के डर से संक्रमित लाशों को जलाना, दफनाने के मुक़ाबले ज़्यादा पसंद किया जा रहा है यहां तक कि ईसाई समुदाय भी इसके लिए किसी हद तक तैयार हो गया। ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि प्राचीन मिस्र में संक्रमित लाशों के जलाने के क्षेत्र को ‘सक़्क़रा’ कहा गया होगा।

सूरह क़मर की एक आयत (54:48) में यूसुफ अली, मोइन शाकिर और मर्माड्यूक पिकथाल ने ‘सक़र’ के अर्थ को नर्क के रूप में अनुवादित किया है। सूरह मुद्दस्सिर की आयतों (74:26, 27 और 42) में इस शब्द को पहले दो टीकाकारों ने ‘नरक की अग्नि’ के रूप में माना है, जबकि पिकथाल इसे ‘जलने’ की क्रिया के रूप में लेते हैं। अबुल आला मौदुदी की उर्दू तफ्सीर के अंग्रेजी अनुवाद में आयत 54:48 में इसे ‘फ्लेम’ यानी ज्वाला कहा है, जबकि मुद्दस्सिर की तीन आयतों में इसे नर्क के अर्थ में लिया गया है। अब्दुल माजिद दरियाबादी आयत 54:48 में सक़र को ‘झुलसने’ के रूप में लिया और सूरह 74 की तीनों आयतों में इसे ‘झुलसाने वाली आग’ कहा है। वर्तमान संदर्भ के लिए, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि क़ुरआन में ‘सक़र’ शब्द जलाने वाली किसी चीज़ को दर्शाता है।

दिव्य सेना

वर्तमान चर्चा के लिए प्रासंगिक सूरह (74:31) का एक और शब्द ‘जुनूद’ (फौज) है। ‘जुनद’ (جند) या इसका बहुवचन ‘जुनूद’ शब्द क़ुरआन में 29 बार आया है और इसका अनुवाद सेना, भीड़, रक्षक, सैनिक, आदि के रूप में किया गया है। ये सैनिक या सेनाएं इंसानों की हो सकती हैं, जैसे कि तालूत, सुलैमान, फिरऔन, समूद और मक्का के इस्लाम विरोधियों की या प्राकृतिक शक्तियों के रूप में या 9:26, 9:40, 33:9, 36:28, 37:173, 48:4, 67:20 और 74:31 जैसी आयतों में किसी अदृश्य शक्ति या दिव्य सेना के रूप में ईश्वर की वाहिनी। सूरह के संबंधित भाग (74:31) का अनुवाद यूसुफ़ अली ने यूं किया गया है, “और तेरे प्रभु की शक्तियों को कोई नहीं जान सकता, सिवाय स्वयं उसके।” इसका अर्थ यह हो सकता है कि या तो ऐसी शक्तियां अदृश्य हैं जिनके केवल घातक प्रभाव लोगों पर स्पष्ट होते हैं या उनका हमला अप्रत्याशित होता है। अल्लाह की वाहिनी का भेजा जाना अक्सर क़ुरआन में चेतावनी के रूप में और साथ ही मानवीय गलतियों को ठीक करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। उदाहरण के लिए आयत 37:173 कहती है, “और वह हमारा सैन्यदल! वे ही विजेता होंगे” एक दिव्य मिशन का समर्थन करने वाली वाहिनी के रूप में। मक्का के इस्लाम विरोधियों को दी गई यह चेतावनी कुछ सालों के बाद बद्र की लड़ाई में पूरी हुई जब फरिश्तों ने लड़ाई में मक्का से आये हमलावरों को नुक़सान पहुंचाया।

अध्याय के ऐसे शब्दों के अर्थों जैसे नक़ुर, सक़रा, जुनूद और कोड-19 पर उपरोक्त चर्चा और विवरण से अनुमान लगाया जा सकता है कि इस सूरह में वर्तमान या इसी तरह की महामारियों के कुछ संदर्भ हैं। इस बारे में, वर्तमान वैज्ञानिक समझ के आधार पर पूरे अध्याय की व्याख्या आयतों के अनुसार करना यहां प्रासंगिक लगता है।

आयात 1-7:

“हे वह, जो है एक सुरक्षा कवच में उपस्थित! उठो और चेतावनी दो (लोगों को) और अपने प्रभु की महिमा का बयान करो और अपने कपड़ों को साफ रखो और छूत से दूर रहो और अधिक प्राप्त करने के लिए एहसान न जताओ, लेकिन दृढ़ रहो।”

मुद्दस्सिर को यहां ‘एक संरक्षित व्यक्ति’ के रूप में लिया गया है। अध्याय 73 में, मुज़म्मिल शब्द का उपयोग इसी उद्देश्य के लिए किया गया है। हालांकि दोनों शब्दों को आमतौर पर पर्यायवाची माना जाता है, जिसका अर्थ होता है एक ढंका हुआ या कपड़ों में लिपटा हुआ व्यक्ति, मगर उनके मूल अर्थ कुछ अलग संदेश देते हैं। एक्सप्लोरिंग-इस्लाम.कॉम पर, फरहत शफी की यह टिप्पणी है कि मुज़म्मिल मूलशब्द ‘ज़म्ल’ से बना है जब कि मुद्दस्सिर ‘दसिर’ से (जैसा कि अल-तहक़ीक़ फी कलामत-अल-क़ुरआन अल-करीम में दर्ज है, 4:348)। वे कहते हैं, “इससे जो नतीजा निकाला जा सकता है, वह यह है कि मुज़म्मिल और मुद्दस्सिर दोनों लबादा या चादर से ढकने का उल्लेख करते हैं, जबकि मुज़म्मिल में यह साधन भावनात्मक रूप से अधिक गंभीर होता है जैसे कि कोई ख़ुद को आराम देने की कोशिश कर रहा हो, जबकि मुद्दस्सिर का अर्थ है स्वयं को शारीरिक रूप से सुरक्षित करना है।” दूसरे शब्दों में, मुज़म्मिल का उपयोग एक प्रकार के मानसिक भय को दर्शाने के लिए किया जाता है जबकि मुद्दस्सिर किसी बाहरी नुक़सान से सुरक्षा को व्यक्त करता है। इन दो मूलशब्दों से व्युत्पन्न कई शब्दों का आधुनिक उपयोग, जैसा कि अल्मानेअ.कॉम से नोट किया जा सकता है, इंगित करता है कि ‘ज़म्ल’ का तात्पर्य घावों आदि पर किसी चीज़ के लपेटने से है जबकि ‘दसिर’ सुरक्षा के लिए पहने गए परिधान की ओर इशारा करता है। वर्तमान संदर्भ में, यह अच्छी तरह से समझा जा सकता है कि मुद्दस्सिर एक जैकेट की मदद से संरक्षित व्यक्ति को कहा जा सकता है। आजकल, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) एक संरक्षित व्यक्ति की भरपूर तस्वीर पेश करता है। इन आयतों का जो अर्थ समझ में आता है वह यह कि इस तरह का एक संरक्षित व्यक्ति, जो एक ही समय में संक्रमण के भय और ज़िम्मेदारी की भावना दोनों से गुज़र रहा है, उसे आगे आना चाहिए और लोगों को प्रकोप से डराना चाहिए और सर्वशक्तिमान की महानता की घोषणा करते हुए चेतावनी देनी चाहिए और उसे बिना किसी लालच के अपनी ज़िम्मेदारी पर जमे रहना चाहिए।

आयत 4, “और, कपड़े साफ रखो” में शब्द ‘सियाब’ (ثیاب) का इस्तेमाल हुआ है, जिसका अर्थ ‘लबादे’ से है, न कि नियमित कपड़ों से। सूरह में ज़ोर दिया गया है कि पोशाक या उसके ऊपर किसी भी आवरण को शुद्ध किया जाना चाहिए या वर्तमान संदर्भ में उसे ‘सेनीटाइज़’ होना लिया जा सकता है।

आयत 5 में ‘रूजज़’ शब्द को आमतौर पर ‘अस्वच्छता’ के रूप में अनुवादित किया गया है। इसका शास्त्रीय अर्थ मूर्तिपूजा जैसी मानसिक अवस्था से लिया गया है। हालांकि, यह कोई साधारण अशुद्धता नहीं है। क़ुरआन की कुछ अन्य आयतों में रूजज़ शब्द किसी आपदा से संबंधित कुछ चीज़ों को दर्शाता है जैसे कि – “हम गुनहगारों पर आकाश से एक सज़ा [रिजज़न] भेजते हैं।” (2:59) इसलिए, इस शब्द को वर्तमान संदर्भ में एक छूत के प्रकोप के रूप में लिया जा सकता है। इसी आयत में ‘फहजुर’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है यानी दूर रहो, जो शब्द हिजरत यानी “कहीं दूर सुरक्षित जगह पर चले जाना” के साथ अर्थ साझा करता है। इसलिए, यहां आयत को ऐसी आपदा से पूरी तरह से दूर रहने की आज्ञा के रूप में लिया जा सकता है जो कि छूत की बीमारी से लोगों के नुक़सान का एक बड़ा कारण हो। टिप्पणीकार आमतौर पर इस शब्द का अनुवाद ‘बचना’ करते हैं, लेकिन ‘फहजुर’ शब्द स्वयं को हानिकारक चीज़ों से पूर्ण रूप से सुरक्षित रखने और इसकी गंभीरता को बताता है।

यह विचारणीय है कि सूरह का यह पहला भाग यह आज्ञा देता है कि किसी भी संरक्षित व्यक्ति को छूत और सांसारिक लाभों के प्रति सतर्क रहते हुए, लोगों को जारी आपदा, उसके कारणों और परिणामों के बारे में सचेत करना चाहिए। जैसा कि आगे समझा जाएगा कि यह सांसारिक लोभ ही है जो इस विपत्ति को लाया है और इसलिए इस चुनौती से निपटने के लिए हर स्तर पर सांसारिक लोभ से दूर रहते हुए दृढ़ता से काम करना चाहिए।

आयात 8-10

“और जब कुरुना तेज़ी से फैल जाएगा, तो यह बहुत कठिन समय होगा और नास्तिकों के लिए (इसे सहन करना) आसान नहीं होगा।”

जैसा कि पहले बताया जा चुका है, ‘क़ाफ़ रे नून’ (क़र्न) से बने दो शब्दों, नुक़िर और नाक़ूर, का इस्तेमाल आयत 8 में किया गया है, जो मानव कोरोना वायरस को पूरी तरह से परिभाषित करते हैं; इसलिए इस आयत की व्याख्या के प्रचलित अर्थ – जब संसार के अंतकाल का सूर फूंका जाएगा – से थोड़ा हट कर इसका अर्थ लिया जा रहा है। आयत में यह टिप्पणी की गई है कि यह लोगों के लिए मुश्किल समय होगा और बड़ी संख्या में लोगों को इसका सामना करना पड़ेगा और यह दिन “नास्तिकों के लिए कठिन” भी होगा। इन आयतों के गठन से अनुमान लगाया जा सकता है कि यह विपदा अंतकाल से काफी पहले होगी। शब्द ‘कठिनाई’ और ‘असुविधा’ जैसे शब्द शायद ही अंतकाल की गंभीरता को दर्शाते हों जो कि एक बहुत ही अनिश्चित स्थिति होगी। कॉर्पस.क़ुरआन.कॉम के अनुसार, इस आयत के असीर (عسیر) शब्द का इस्तेमाल क़ुरआन की तीन आयतों में एक विशेषण ‘कठिन’ के रूप में किया गया है, जिनमें यह आयत भी शामिल है। इसलिए, किसी स्थिति की कठिनाई और परम संकट के बीच तुलनात्मक अंतर को समझा जाना चाहिए। आधुनिक अरबी में, ‘असीर’ शब्द कुछ बीमारियों के अलावा दिवालियापन, ग़रीबी, आदि को दर्शाता है जो कि किसी भी व्यक्ति के लिए कठिनाई का कारण बनें। इस शब्द को सूरह नशरह की दो आयतों (94:5-6) में हज़रत मुहम्मद (स.) के अपने मिशन में आ रही शुरू की कठिनाइयों के लिए इस्तेमाल किया गया है। आपदा का यह दिन या समय सभी के लिए असामान्य कठिनाई और नास्तिकों के लिए अतिरिक्त आशंका का विषय हो सकता है, मुख्यतः इसके परिणाम स्वरूप होने वाली आर्थिक गिरावट और फिर गहरा आर्थिक संकट। अगर यह अंतकाल की ओर इशारा होता तो इस तरह के शब्दों को इन आयतों में (शायद) नहीं अपनाया जाता। इस आयत में आया ‘यौम’ शब्द का उपयोग क़ुरआन में एक दिन, लंबे समय, चरण या उम्र का उल्लेख करते हुए किया जाता है। इस प्रकार, ऐसा लगता है कि मूलशब्द ‘क़ाफ़ रे नून’ से जुड़े दो शब्द और आयत 9 और 10 की बनावट से मानव इतिहास के एक कोरोना काल के कठिन समय के बारे में इशारा किया गया है, न कि संसार के अंत का। यह समझा जा सकता है कि यहां वर्णित विपत्तिपूर्ण काल (यौम) मूल रूप से अर्थव्यवस्था को बाधित करेगा और आस्थावानों के लिए भी कठिन होगा मगर धनवान नास्तिकों के लिए और मुश्किल होगा। हालांकि, स्थिति के अन्य प्रभावों, जैसा कि यहां विभिन्न आयतों में वर्णित है, यह एक स्वास्थ्य संबंधी आपदाकाल होगा।

आयात 11-25

“मुझे और जिसको मैंने ख़ुद पैदा किया है (निपटने के लिए) अकेला छोड़ दो, और जिसे मैंने व्यापक धन और चौकस अनुयाई दिये और उसके सामने [वह सब कुछ] रख दिया जिससे [उसका जीवन] आसान हुआ। नहीं! वास्तव में, वह हमारे संकेतों से मुंह फेरता है। मैं उस पर आपदाओं की एक श्रृंखला के साथ बोझ डालूंगा। दरअसल, उसने सोचा, फिर विचार किया। उसका नाश हो, उसने क्या सोचा? फिरसे उसका नाश हो, उसने क्या सोचा? तब उसने [फिर से] विचार किया; फिर, उसने भृकुटी तानी और बुरा-भला कहने लगा; तब वह पीछे मुड़ा और अभिमान से कहा – यह (क़ुरआन) जादू की एक नक़ल है। यह एक इंसानी बयान के सिवा कुछ नहीं है।”

यहां, पद 13 में ‘बनीना शहूदा’ का अनुवाद ‘चौकस अनुयायियों’ के रूप में किया गया है, हालांकि आमतौर पर टिप्पणीकार इसे उन बेटों के उल्लेख की तरह समझते हैं जो हमेशा अपने पिता के साथ रहते हों। सही-इंटरनेशनल ने आयत के इस हिस्से का अनुवाद “और उसके साथ मौजूद संतान” के रूप में किया है। वास्तव में, ‘बनीना’ शब्द बेटों, बेटों और बेटियों, बच्चों, संतानों और क़बीले के साथियों को दर्शाता है। इसलिए, वर्तमान संदर्भ में इस शब्द को अनुयायियों के रूप में लिया गया है। अल्लामा यूसुफ़ अली इसे ‘अनुयाइयों का एक बड़ा संगठन’ के रूप में लिखते हैं। इन आयतों को क़ुरआन के अवतरण के इतिहास में वलीद बिन अल-मुग़ीरा के नेतृत्व में मक्का के प्रमुख आस्थाहीन सरदारों के लिए एक चेतावनी के रूप में माना जाता है। यूसुफ अली कहते हैं, “सभी युगों में वलीद होते हैं,” और वर्तमान युग में भी होंगे। विचार करने पर, आज के वैश्विक नेताओं में ऐतिहासिक वलीद बिन अल-मुग़ीरा जैसे एक या कई चरित्र नज़र आएंगे। ये आयतें ऐसे किरदार वाले व्यक्ति पर तीन दिव्य एहसानों को गिनाती हैं, यानी धन, समर्थकों की बड़ी संख्या और बचपन से जीवन की सुख-सुविधाएं। उसे यहां बयान किए गए तीन नकारात्मक गुणों पर भी खरा होना चाहिए, अर्थात् पवित्र क़ुरआन का विरोध, अहंकार और बड़बोलापन।

पद 17, अल्लाह के इस फैसले के बारे में सूचित करता है कि वह अपने संकेतों का विरोध करने वाले विरोधी को दंडित करने वाला है, जो कहता है, “जल्द ही मैं उसे विपत्तियों के पहाड़ पर ले जाऊंगा।” अरबी शब्द ‘सऊद’ (صعود) आमतौर पर पीड़ा के रूप में अनुवादित किया जाता है जैसा कि मशहूर इस्लामी विद्वान क़तादा ने किया है। इब्ने कसीर ने इसे नर्क की एक फिसलन भरी चट्टान बताया है। यूसुफ़ अली ने इसका अर्थ “विपत्तियों का पहाड़” समझा है, जिसे वे एक के बाद एक आने वाला “संचयी संकट” कहते हैं। शब्दकोष में इसके कुछ अतिरिक्त अर्थ भी मिलते है जैसे कि चढ़ाई, वृद्धि, अचानक उभरने वाला शक्तिशाली ज्वार या एक बड़ी भीड़ की आवाजाही। यहां यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इस आयत में यह शब्द न केवल एक आपदा को दर्शा रहा है, बल्कि ऐसी जो अचानक एक बड़ा रूप ले ले और एक के बाद एक आपदाओं की एक श्रृंखला हो। कोविद-19 का संक्रमण कुछ ऐसा ही है।

यहां, यह सवाल उठ सकता है कि विश्व का कोई भी बड़ा नेता कोविद-19 का शिकार नहीं हुआ है, इसलिए यह आयत वर्तमान संदर्भ में लागू नहीं होती है। सबसे पहले, यह आयत बता रही है कि अहंकारी व्यक्ति या नेतृत्व विपत्तियों से बोझिल होगा, ज़रूरी नहीं है कि इसके परिणाम में स्वयं उसकी मौत ही हो जाए, कम से कम तुरंत। अपनी हठ के परिणामों का सामना करने के लिए वलीद बिन अल-मुग़ीरा को नौ साल लग गए। एक कथन के अनुसार (विकिपीडिया.कॉम), “उसकी एड़ी के नीचे एक पुराना छोटा-सा घाव था। यह कुछ साल पहले उसे उस समय हो गया था जब वह कहीं जा रहा था और पीछे से किसी ने पंख लगा तीर चला दिया जो कि उसके लबादे को चीरता हुआ उसके पैर पर खरोंच मार गया – सिर्फ एक छोटा-सा घाव और कुछ नहीं।” यह घाव सूख कर बेजान हो चुका था। इस सूरह के अवतरण और इन आयतों में छुपी चेतावनी के प्रति उसकी उदासीनता के बाद यह घाव फिर से हरा हो गया और बहुत ही पीड़ा झेलने के बाद उसकी मृत्यु हो गई। इसलिए, वर्तमान वलीद या वलीदों के मामले में भी यह भविष्य में जल्द ही सामने आ सकता है। या शायद, वह पहले ही अग्नि परीक्षा से गुज़र चुका या चुके हों और यह अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया हो। मीडिया में यह बात आ चुकी है कि किस तरह कोविड-19 कुछ ख़ास महलों और ऊंचे दफ्तरों तक दस्तक दे चुका है। वर्तमान दुनिया का अहंकारी और लालच से प्रेरित नेतृत्व व्यक्तिगत रूप से जल्द ही कोई गंभीर परिणाम भुगत सकता है।

एक विद्वान हुसैन अब्दुल-रऊफ़ कहते हैं, “यह अर्द्धवाक्य (सक़र) ‘सक़्क़र’ से जुड़ा है, जिसका अर्थ है कोई ऐसा व्यक्ति जो दूसरों का बुरा चाहता हो और झूठे आरोप लगाता हो, ऐसा व्यक्ति जो बिना किसी कारण के लोगों की प्रतिष्ठा को धूमिल करता हो।”[5] सक़र-19 की मौजूदा महामारी के दौरान सक़्क़र एक ऐसे चरित्र की ओर इशारा करता है जिसमें यह अवगुण भी पाया जाता हो।

आयात 26-30

“मैं उसे सक़र में जलाऊंगा। और तुम्हें क्या पता है कि सक़र क्या है? यह किसी से दूर नहीं और किसी को भी नहीं छोड़ती, यह मनुष्य की त्वचा को नुक़सान पहुंचाती है। इसके ऊपर उन्नीस है। “

जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है, ‘सक़र’ एक ऐसी चीज़ को कहते हैं जो जलाती है। इसका अर्थ अक्सर नर्क या नर्क की आग लिया जाता है, लेकिन यह कोई भी ऐसी चीज़ हो सकती है जो इंसान को जलाए। क़ुरआन सूचित कर रहा है कि उक्त अहंकारी व्यक्ति और उसके अनुयायियों को एक आग घेर लेगी या उसे आपदाओं की एक श्रृंखला का सामना करना पड़ेगा जो संभावित रूप से किसी को भी जला सकती है। सक़र किसी को भी प्रभावित होने से नहीं छोड़ती। इसका मतलब है, यह हर किसी के लिए और हर जगह हानिकारक होगी।

इन आयतों में ‘सक़र’ के बारे में सवाल करना बहुत ही असामान्य और अज्ञात चीज़ का संकेत है यानी सक़र क्या है यह उस समय के लोग नहीं जानते थे और हो सकता है कि यह शब्द भी उन्होंने पहली बार सुना हो। अगर यह परम्परागत रूप से नर्क की आग को दर्शाता था, तो इस पर प्रश्न खड़ा करने का कोई उद्देश्य नहीं है। आयत दिखा रही है कि अल्लाह किसी अज्ञात और अपरिभाषित घटना के बारे में सूचित कर रहा है। हो सकता है कि पुराने अरब लोग सक़र को किसी जलाने वाली चीज़ के रूप में जानते हों, मगर वे अनुमान लगा रहे होंगे कि कैसे एक अहंकारी व्यक्ति उससे जल जाएगा। शायद, वे संतुष्ट थे कि जो भी होगा परलोक में होगा। इसलिए, ‘सक़र’ का यह अनोखा उल्लेख इस बात की ओर इशारा है कि सक़र नर्क से कुछ अलग है, जिसे अरब लोग जहन्नम कहते थे।

इन आयतों में शब्द سَأُصْلِيهِ (सउस्लीह) का उपयोग सक़र के साथ किया गया है जिसे आमतौर पर “मैं उसे ले जाऊंगा” के रूप में अनुवादित किया जाता है। हालाँकि, अल्मानेअ.कॉम के अनुसार इसका मतलब यह भी हो सकता है कि “मैं उसे जला दूंगा”। क़ुरआन में मूलशब्द ‘स्वाद लाम य’ से बने अधिकांश शब्दों को जलने-जलाने के लिए इस्तेमाल किया गया है। उदाहरण के लिए आयत 4:115 में इस शब्द का प्रयोग आयत में यूं किया गया है, “हम उन्हें आग में जलाएंगे।” चिकित्साशास्त्र में इस शब्द का उपयोग मानव शरीर के आंतरिक अंगों की परतों की जलन के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए “सउस्लीह” का अनुवाद जो आमतौर पर ले जाना किया जाता है उसके बजाय “मैं उसे सक़र से जलाऊंगा” ज़्यादा सटीक है।

जैसा कि अब यह व्यापक रूप से ज्ञात है, मानव शरीर पर कोविद-19 का प्रभाव एक असहनीय झुरझुरी, सूजन और जलन है, जिससे एक रोगी गुज़रता है। आयत 29 के शब्द ‘वाव ह य’ (و ح ي) को सही-इंटरनेशनल में “ब्लैकनिंग” यानी काला कर देना के रूप में समझा गया है। हालांकि, युसुफ अली के अनुवाद में इसे “मनुष्य के रंग को काला करना और बदल देना” के रूप में समझा गया है, मार्माड्यूक पिकथल में, “यह मनुष्य में झुरझरी पैदा करता है” और मोइन हबीब शाकिर में, “यह नश्वर को झुलसा देता है।” इस प्रकार, त्वचा के रंग का परिवर्तन या मनुष्य का रूप जैसे कि ‘सक़र’ के संपर्क में होने के परिणामस्वरूप मनोवैज्ञानिक या शारीरिक रूप से हो सकता है और जरूरी नहीं है कि आयत में इसे त्वचा के वास्तविक जलने या एक इंसान रंग बदलने से ही लिया हो। जैसा कि पिकथल कहते हैं, इसका अर्थ तीव्र बुखार में मरीज़ का जलना और उसके कारण शरीर पर गंभीर प्रभाव पड़ना भी हो सकता है। कोविद-19 के रोगी इन सभी परिवर्तनों से गुजरते हैं; वे एक तेज़ बुख़ार में तड़पते हैं, कपकपी महसूस करते हैं, हाथ-पैरों और आंतरिक अंगों में जलन और तेज़ दर्द होता है, उनके आंतरिक परतों का रंग जैसे कि गला और फेफड़ों का बदल जाता है और चिंता और ख़ून के जमने के कारण रोगी का चेहरा और शरीर काला पड़ने लगता है। एक्सप्रेस.को.यूके में बताया गया है, “इंग्लैंड में कोविद-19 के कुछ रोगियों ने अपने हाथों में एक कपकपी और स्टेटिक जैसा दर्द होने की सूचना दी है, जबकि, अन्य लोगों ने ख़ुलासा किया है कि उन्होंने अपनी त्वचा पर ऐसा महसूस किया है जैसे कि बिजली का करंट दौड़ा हो। एक और मरीज़ ने कोरोनोवायरस बीमारी की पहली चेतावनी के रूप में अपने हाथ-पैरों में सनसनाहट महसूस होने की सूचना दी।”[6]

ठीक हुए कुछ रोगियों ने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कहा है कि जैसे वे किसी आग के महासागर से गुज़रे हों। एक दक्षिण कोरियाई इंजीनियरिंग प्रोफेसर ने इन शब्दों में अपनी व्यथा को याद किया, “यह एक रोलर-कोस्टर की तरह था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कि मेरी छाती पर एक मोटी प्लेट मुझे दबा रही हो और मेरी छाती पर सूइयां चुभ रही हों।” एक चीनी युवक ने अपने कष्टों को “नरक के द्वार” से वापस आने के रूप में याद किया। इंटरनेट पर ऐसे मरीज़ों की संख्या बहुत अधिक है जिन्हों ने कोविड-19 के अपने अनुभव लोगों के साथ साझा किये। यह महज़ एक संयोग नहीं हो सकता है कि वर्तमान महामारी के मुद्दे पर एक आगामी फिल्म का नाम “आग से पहले” (Before the Fire) रखा गया है, जो इस महामारी को एक तरह की आग के रूप में दर्शाते हुए यह बताने जा रही है कि किस तरह इसने हर तरफ तेज़ी से फैल कर लोगों के जीवन को प्रभावित किया है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने नए कोविद सिंड्रोम से जूझ रहे एक किशोर को उद्धृत किया जिसे लगा कि “उसकी नसों में सीधी आग बह रही हो।” इस अख़बार में ओप-एड की यह टिप्पणी भी अहम है, “अब, विश्व आग की कई ड्रिल के बाद एक वास्तविक आग का सामना कर रहा।” आखिरकार, “आग की तरह फैलना” यह मुहावरा कोविद-19 के संक्रमण के लिए एकदम सटीक है। इंग्लिश में तेज़ी से होना वाले काम को भी आग (fire) कहते हैं जैसे कि बंदूक़ या तोप का चलना या ऑफिस से किसी को फौरन निकाल देना, वग़ैरह। मानसिक चिंता को भी एक तरह की अग्नि माना जाता है, जैसे कि कहा जाता है, “चिंता चिता समान है।”

इस परिदृश्य में, शब्द ‘सक़र’ को सक़र-19 (अग्नि-19) कहना ज़्यादा सही होगा, क्योंकि यह संक्रमित व्यक्तियों को अचानक मानसिक और शारीरिक रूप से जलन प्रदान करता है और कभी कभी जान भी ले लेता है।

क़ुरआन की एक आयत यह भी बताती है कि यह जलन मुख्य रूप से मनुष्य के चेहरे के स्पर्श के माध्यम से शरीर को प्रभावित करेगी। सूरह अल-क़मर का पद 48 है, “जिस दिन वे अपने चेहरे से आग (नार) में खींचे जाएंगे [और यह कहा जाएगा], “सक़र के स्पर्श (मस्सा) का स्वाद चखो।” परम्परागत रूप से, इस आयत की व्याख्या इस रूप में की गई है, जैसे कि अल-जलालैन में, कि नर्क के लोगों को उनके चेहरे के बल घसीटा जाएगा। यह बयान थोड़ा अस्पष्ट रहेगा कि किसी को चेहरे के बल कैसे घसीटा जा सकता है? जबकि कोविड-19 से यह स्पष्ट हो जाता है क्योंकि यह वायरस छूने या रगड़ने (मस्सा) से फैलता है और चेहरे (वजह) और गले को पकड़ लेता है और फिर फेफड़ों में प्रवेश करता है और फिर शुरू होता है आग के दरिया का एक सफर। इस आयत में नार (अग्नि) शब्द का अर्थ नर्क के बजाय दुनिया की कोई आग भी हो सकती है जैसे कि हज़रत मूसा ने ‘जलती हुई झाड़ी’  में जो आग देखी थी उसे क़ुरआन (20:10) ने ‘नार’ कहा है। इसलिए, यह शब्द हमेशा नर्क का अर्थ नहीं देता है; यह कोई भी आग या जलाने वाली कोई भी चीज़ हो सकती है।

सूरह क़मर में, शब्द ‘सक़र’ का इशारा एक सांसारिक घटना के रूप में है, न कि परलोक से संबंधित। इस अध्याय की शुरुआत यह दोष देते हुए होती है कि नास्तिक लोग आसमानी संकेतों का महत्व महसूस नहीं करते। इसके बाद नूह, आद, समूद, लूत और फिरऔन के राष्ट्रों के सामने आने वाले संकटों को एक-एक करके विस्तार से बयान किया गया। इसके बाद यह टिप्पणी की गई है कि वर्तमान समय के अविश्वासी भी इस मामले में पिछले लोगों से अलग नहीं हैं और यह कि वे एक निश्चित आपदा से बचने के मामले में किसी शास्त्र में कोई आश्वासन नहीं पायेंगे। फिर, यह चेतावनी दी गई है कि आपसी सहयोग से गलत नीतियों का सहारा लेने वाले लोग आगामी आपदा से बच नहीं पायेंगे। और, तब ‘सक़र’ वाली आयत (54:48) आती है, जो कहती है, “उस दिन वे चेहरे पर छाई आग में घसीटे जाएंगे और कहा जाएगा सक़र को छूने का मज़ा चखो।” इसके बाद की आयत में अल्लाह कहता है, “और, हमने पहले भी तुम जैसों को नष्ट कर दिया, तो है कोई विचार करने वाला?” अध्याय इस टिप्पणी के साथ समाप्त होता है कि सब कुछ रिकॉर्ड में है और अच्छे लोगों को स्वर्ग में पुरस्कृत किया जाएगा। इस प्रकार, सूरह क़मर में ‘सक़र’ का उल्लेख संसार की एक अपमानित सज़ा के रूप में हुआ है। और, सूरह मुद्दस्सिर में भी इस शब्द का तीन बार उल्लेख इसी परिदृश्य में होना चाहिए।

सूरह मुद्दस्सिर के इन पदों में यह भी उल्लेख किया गया है कि सक़र किसी को भी नहीं छोड़ता, यानी यह एक सार्वजनिक आपदा है। जैसा कि सूरह क़मर में उल्लेख है, पवित्र ग्रंथों में सक़र नाम की इस आपदा से किसी को भी कोई राहत देने का वादा नहीं किया गया है, हालांकि वे स्वयं को सुरक्षित मान सकते हैं, सिवाय यह कि लोग अपने जीवन में नैतिक बदलाव लाएं। वर्तमान महामारी में यह स्थिति स्पष्ट है, जिसमें सभी मस्जिदों, चर्चों, मंदिरों, साइनोगॉग, पैगोडा और अन्य धार्मिकस्थलों को बंद करना पड़ा है और मानव जाति के प्रत्येक वर्ग को अपनी धार्मिक पृष्ठभूमि और दावों के बावजूद इस महामारी से कोई राहत नहीं मिली है।

सबसे महत्वपूर्ण बात, कोविद-19 की ओर इशारा करते हुए पद 30 में उल्लिखित आंकड़ा ‘19’ है जो कि सक़र से जोड़ कर देखा जाना चाहिये, जो एक अहंकारी व्यक्ति और उसके सहयोगियों की परीक्षा के बारे में सभी संदेहों को दूर कर देता है, हालांकि दुनिया भर में हर कोई इस मुसीबत का सामना कर रहा है।

आयत 31

“और हमने फरिश्तों के अलावा किसी को भी आग का साथी नहीं बनाया है। और हमने इसको (19) आस्थाहीन लोगों के लिए एक विचारणीय संख्या बनाई है, इससे वे लोग आश्वस्त होंगे जिन्हें शास्त्र दिये गये और जो आस्थावान हैं उनका विश्वास और गहरा होगा और जिन्हें पवित्रशास्त्र और आस्था दी गई वे संदेह नहीं करेंगे (कि यह ईश्वर की ओर से है), और जिनके दिलों में पाखंड है और जो आस्थाहीन हैं वे कहेंगे, “अल्लाह इस उदाहरण से क्या चाहता है?” इस प्रकार अल्लाह भटकाता है जिसे वह चाहता है और जिसे चाहता है मार्ग दिखाता है। और तुम्हारे प्रभु के सिवाय उसके सैनिकों को कोई नहीं जानता। और, यह (जलाने वाली हुई पीड़ा) मानवता के लिए एक अनुस्मारक के सिवा कुछ नहीं है।”

यह आयत पहली की सभी आयतों में दिए गए संदेश का निस्कर्ष पेश करती है। यह आयत काव्यात्मक वर्णन के बजाय, जैसा कि सूरह के बाकी आयतें हैं, एक गद्ध्यात्मक बयान है। इस तरह, यह अध्याय के दो काव्य खंडों के बीच में एक गद्ध्य सूचना है। यह आयत मुख्य रूप से इन तथ्यों का उल्लेख कर रही है: आग या सक़र से जुड़ी संख्या यानी 19 को एक परीक्षा बनाया गया है, आस्थावान और जिन लोगों को इससे पहले शास्त्र दिये गये वे तुरंत इसे एक दिव्य संकेत मान लेंगे, जबकि नास्तिकों और पाखंडियों को इसकी उत्पत्ति के बारे में संशय होगा और यह कि इसे प्रभु की ओर से एक अदृश्य वाहिनी के रूप में भेजा हुआ समझा जाए और इससे मानव जाति को ईश्वर और उसकी शक्तियों की याद दिलाई गई है।

आयत की पारम्परिक व्याख्या मुख्य रूप से “असहाब अल-नार” शब्द पर आधारित है, जिसे नर्क के रखवाले या संरक्षक यानी 19 फरिश्तों या देवदूतों को निरूपित करने के लिए लिया जाता है। हालांकि,  ‘असहाब’ शब्द आमतौर पर क़ुरआन और अन्यथा भी साथियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो समर्थकों के रूप में माने जा सकते हैं। यह ‘साहब’ यानी दोस्त का बहुवचन है। सूरह को समझने के लिए एक थोड़े से बदलाव से इसे वर्तमान महामारी की पृष्ठभूमि में समझा जा सकता है, यानी यह माना जाए कि अल्लाह ने आग या सक़र-19 (कोविद-19) का साथ देने और समर्थन करने के लिए फरिश्तों को भी भेजा है, जैसे वह उन्हें हवा या बादल को चलाने के लिए भेजता है और बारिश होती है। एन्जिल, देवदूत या फरिश्ता को आमतौर पर इस्लाम और अन्य आस्थाओं में ईश्वर के एक कार्यकर्ता के रूप में लिया जाता है जो कि प्राकृतिक शक्तियों के साथी के रूप में दिव्य आदेशों को निष्पादित करते हैं। इस आयत पर गहन विचार से यह ज़रूरी नहीं लगता है कि यह ‘19’ को नर्क के संरक्षकों की संख्या के रूप में ही बता रही हो। आयत के अंत में यह जो कहा गया है, “केवल अल्लाह ही अपनी वाहिनी के बारे में जानता है,” इसका संदर्भ इस जगह अप्रासंगिक दिखाई देगा अगर इसे अपने पारम्परिक अर्थों में लिया जाए। ‘सक़र’ शब्द का इस्तेमाल अध्याय में स्त्रीलिंग के रूप में किया गया है और इस आयत में संख्या के हवाले को भी स्त्रीलिंग में ही लिया गया है जबकि अगर यह फरिश्तों का कोई संदर्भ होता तो यह एक पुर्लिंग संदर्भ होता।

सूरह पर उपलब्ध टिप्पणियों में, ’19’ को आमतौर पर नर्क पर नियुक्त 19 देवदूतों के रूप में लिया जाता है। इस संख्या को आयत 31 में अविश्वासियों के लिए ‘फ़ितना’ (परीक्षा) कहा गया है। इसलिए, ऐसा प्रतीत होता है कि पद में संख्या 19 सांसारिक और ऐतिहासिक भाव लिए हुए है। इस सूरह को समझने में एक महत्वपूर्ण मुद्दा संख्या 19 का परीक्षा (फितना) होना है। परीक्षा के रूप में किसी भी चीज़ को प्रस्तुत करने के लिए, यह आवश्यक है कि इस पर एक व्यापक बहस पाई जाए और लोग कोई न कोई पक्ष लेने के लिए मजबूर हों। इतिहास में कभी भी ऐसी स्थिति नहीं रही है कि 19 फरिश्तों को लेकर कोई मुद्दा इस हद तक चर्चा में हो कि जिसमें आस्थावान, शास्त्र को मानने वाले, नास्तिक और पाखंडी अपना अपना पक्ष लेने के लिए मजबूर हुए हों, यहां तक कि हज़रत मुहम्मद (स.) के आख्यानों में भी ‘19 फरिश्तों’ का कोई उल्लेख नहीं है। यह केवल क़ुरआन के व्याख्याकारों का अनुमान रहा है कि पद 30 में ‘उन्नीस’ शब्द को पद 31 में नर्क पर नियुक्त फरिश्तों के रूप में लिया जाना चाहिए। ये आयतें ‘19’ की संख्या को अग्नि के ऊपर होने के बारे में उन लोगों के समर्थन की बात कर रही हैं, जिन्हें क़ुरआन से पहले आसमानी ग्रंथ दिये गए थे। यदि इसकी व्याख्या नर्क पर नियुक्त 19 फरिश्तों के बारे में सूचना देने के रूप में की जाती है, तो आस्थावानों के लिए नर्क के 19 संरक्षक फरिश्तों के बारे में सुनकर प्रसन्न होने का कोई अर्थ नहीं है। इसी तरह, यह संख्या उन लोगों के लिए भी कोई आकर्षण नहीं रखती है जिनको क़ुरआन से पहले धर्मग्रंथ दिये गये क्योंकि उनमें भी नर्क के 19 फरिश्तों का कोई उल्लेख नहीं है। संख्या 19 को लेकर कई मुस्लिम विद्वानों की तरह यहूदी और ईसाई विद्वानों ने एक कोड-19 के रूप इसकी चर्चा ज़रूर की है, लेकिन नर्क के फरिश्तों की गिनती के रूप में नहीं।

ऐंजिलनंबर.ओआरजी के एक लेख में कहा गया है, “बाइबल के अनुसार, नंबर 19 का इस्तेमाल विश्वास के प्रतीक के रूप में किया जाता है। इसका अर्थ है कि जिन लोगों को दैवीय शक्तियों में विश्वास है, उनके पास बेहतर जीवन होगा, प्यार और शांति से भरा।” और यह दावा किया गया है कि बाइबल से जुड़े वी-इलेह शेमोत पाठ में ‘इलोहीम’ शब्द उन्नीस बार दोहराया गया है। इसी तरह बाइबल में कई पवित्र शब्द 19 बार इस्तेमाल हुए हैं। मगर बाइबल में 19 की संख्या कभी भी फरिश्तों के बारे में इस्तेमाल ऩहीं हुई है। जैसा कि बाइबल में संख्या 19 के महत्व के बारे में यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि “इस संबंध में बाइबल के वास्तविक कोड को रब्बी जुडाह ने 12 वीं शताब्दी ईस्वी में पुराने नियम के संरक्षित हिस्से में बयान किया था। यह वही संख्या 19 आधारित गणितीय कोड था जिसे हमने क़ुरआन में खोजा था, सात शताब्दियों बाद।”[8] यहां यह स्पष्ट है कि बाइबल के विद्वान पवित्र चिन्हों के संदर्भ में क़ुरआन में नंबर ‘19’ की संख्या के बारे में सुनने पर इस अद्वितीय कोड को याद कर सकते हैं। यहां यही एक तथ्य है जो क़ुरआन और पहले के धर्मग्रंथों के अनुयायियों के बीच साझा है। इसलिए, संख्या 19 को एक अनोखे संदर्भ के रूप में बेहतर ढंग से तभी समझा जा सकता है, जबकि इसे नर्क के अभिभावक फरिश्तों की अनुमानित संख्या से हट कर एक कोड के रूप में लिया जाए।

यह एक व्यापक रूप से ज्ञात तथ्य है कि अधिकांश धार्मिक परम्पराओं में प्राकृतिक आपदाओं के लिए नैतिक कारणों को माना जाता है, जिनमें प्रकृति की अदृश्य शक्तियां ईश्वर के आदेश पर काम करती हैं।

बाइबल ऐसी मालूमात का एक अच्छा स्रोत है। ‘बाइबल की भविष्यवाणी में कोरोनोवायरस’ नामक किताब के लेखक बिली प्रीविट ने कहा है, “ये मानव जाति पर ईश्वर के प्रकोप को प्रकट करने वाले लक्षण हैं।”[9] अपनी पुस्तक में, लेखक ने यह विचित्र दावा किया है कि कोरोनोवायरस की महामारी और बाइबल में दर्ज मिस्र की आपदाओं के बीच गहरी समानता पाई जाती हैं। जिम डेनिसन के अनुसार आज ईसाई धर्म में “फिरऔन के अहंकार से लेकर मिरियम के नस्लीय पूर्वाग्रह और फिर हेरोद की गर्वित मूर्तिपूजा तक, ईश्वर की ओर से भूत और भविष्य में ऐसे लोगों के विरूद्ध आदेश आते रहे हैं जो उसके वचन और इच्छा को अस्वीकार करते हैं। पवित्रशास्त्र और इतिहास के दौरान, ईश्वर हमारे साथ उतना ही आसान व्यवहार करता है जितना वह कर सकता है या उतना ही कठोर जैसा कि उसे करना चाहिए।”[10]

यहां यह स्पष्ट है कि क़ुरआन को मानने वाले और अहले किताब यानी पिछले धर्मग्रंथों को मानने वाले दोनों कोड-19 पर तभी एकसाथ हो सकते हैं जबकि इस कोड को कोविड-19 की लाई हुई दिव्य आपदा के परिदृश्य में लिया जाए जो कि उन आस्थाहीन लोगों और पाखंडियों के लिए एक परीक्षा की तरह है, जो शायद ही दिव्य आपदा के नैतिक सिद्धांतों पर विश्वास रखते हों। यह स्वाभाविक है कि नूतन कोरोना वायरस धार्मिक समुदायों में वर्चस्ववादी समूहों के अनैतिक व्यवहार के परिणाम के रूप में स्वीकार्य होना चाहिए।

आयत 31 के अंतिम भाग के वर्तमान संदर्भ में यह प्रतीत होता है कि नूतन कोरोना वायरस और फरिश्तों दोनों को ईश्वर के अदृश्य सैनिकों के रूप में प्राकृतिक शक्तियों की तरह उल्लेख किया गया है, जहां ‘सक़र’ के ‘असहाब’ (साथी) के रूप में फरिश्ते भी अपना कोई रोल अदा कर रहे हों। यहां यह भी कहा गया है कि यह प्रकोप मानवता को उसका कर्तव्य याद दिलाता है। मानवता को याद दिलाने के लिए यहां एक बार फिर ‘सक़र’ को नाम लिए बिना अप्रत्यक्ष रूप से उसे नर्क की आग नहीं बल्कि एक सांसारिक घटना के रूप में याद किया गया हो जो मानवता को एक संदेश देती हो।

आयात 32-56

इन आयतों का सार यह है कि प्रकृति में किसी भी परिवर्तन का एक दिव्य कारण होता है, उदाहरण के लिए रात के प्रतिनिधि के रूप में चंद्रमा का उदय और फिर रात का प्रस्थान और एक उज्ज्वल सुबह की वापसी। आयत 35-36 में कहा गया है कि सक़र-19 का विप्लव मानव जाति के लिए एक गंभीर चेतावनी है। और, शायद मानव इतिहास के एक नये चरण के आगमन की सूचना एक उज्ज्वल सुबह की ख़बर में छुपी हुई है। फिर, यह उल्लेख किया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्म के लिए जवाबदेह माना जाएगा। सदाचारी को स्वर्ग के रूप में उचित पुरस्कार प्राप्त होगा और बुरे लोगों को नर्क में डाल दिया जाएगा।

आयत 35-36 में एक स्पष्ट संकेत यह भी है कि अग्नि या सक़र-19 के बारे में जो कुछ भी कहा गया है, उसका प्रमुख कारण जीवन में एक पूंजीवादी सोच है जिसे इस पूरे धटनाक्रम में खलनायक के रूप में देखा जा सकता है, और उसके साक्षात प्रतिनिधि को शुरू की कुछ आयतों में फटकारा गया है। पद 37 में, यह उल्लेख किया गया है कि यह चेतावनी उन सभी लोगों के लिए है जो या तो इस तबाही से पहले आए थे या बाद में आएंगे, यानी अगर इसे गंभीरता से नहीं लिया गया तो इस तरह की आपदा को दोहराया भी जा सकता है। डॉ. मुस्तफा खत्ताब के आयत 38 के अनुवाद में कहा गया है, “हर आत्मा को उसके (बुरे) कर्म के लिए हिरासत (detained) में लिया जाएगा।” शायद, यह वैश्विक लॉकडाउन की ओर संकेत करता है, जिसमें सभी लोगों को अपने घरों में महामारी की स्थिति के कारण हिरासत में रहना पड़ेगा, जिनमें से अधिकांश ने एक भ्रष्ट प्रणाली और नेतृत्व का समर्थन किया है या कम से कम विरोध तो नहीं किया है। और, यह सज़ा लोगों के विभिन्न अनैतिक आचरण के अनुसार तय होगी।

‘सक़र’ का एक दिलचस्प संदर्भ एक बार फिर से आयत 42 में आया है। स्वर्ग प्राप्त करने वाले नर्क में पड़े लोगों से पूछेंगे, “तुम्हें किस चीज़ ने सक़र में धकेल दिया?” यह एक अजीब सवाल है। स्वर्ग वाले और नर्क वाले दोनों जानते हैं कि जो लोग नर्क में हैं वे अपने निश्चित पापों की वजह से हैं। यहां स़क़र को नर्क या नर्क की आग के अर्थ में लेने का कोई उचित कारण नहीं लगता है। यह सवाल इस बात की ओर इशारा करता है कि संसार में कोई ऐसी ख़ास घटना हुई जिसके बारे में स्वर्ग वालों में बहुत-से लोगों को शायद नहीं मालूम होगा और वे उन लोगों से पूछ रहे हैं जो उससे पीड़ित रहे और अब वे नर्क में भी डाल दिए गए। अगली आयतों से भी ऐसा प्रतीत होता है। पीड़ित लोगों के पूंजीवादी व्यवहार का हवाला एक बार फिर आयत 44 में आया है, जिसके कारण अपराधियों को नर्क में डाल दिया जाता है और कुछ अन्य कारणों के अलावा उनकी सज़ा के कारणों को याद किया जाता है। उनके ही बयान के अनुसार उनका अपराध यह था, “हम ग़रीबों को खाना नहीं खिलाते थे।” आयत 48 का अनुवाद इस प्रकार किया गया है, “तो इससे उन्हें [किसी की भी] सिफारिश का लाभ नहीं होगा।” इस आयत से यह संकेत मिलता है कि सक़र के दौर में किसी भी प्रकार की धर्म आधारित सुरक्षा की कोई उम्मीद नहीं होगी। मस्जिद, चर्च, मंदिर, सैनोगाग, पैगोडा और अन्य आध्यात्मिक स्थान बंद हो जाएंगे और कोई भी पवित्र एजेंट उस सज़ा से बचावकर्ता के रूप में खड़ा नहीं हो सकेगा। यह इस बात का स्वाभाविक परिणाम होगा कि दुनिया के धार्मिक वर्ग दबंग पूंजीवादी व्यवस्था का या तो साथ दे रहे होंगे या उसका मुक़ाबला करने में विफल होंगे।

अध्याय 74 इस कथन के साथ बंद हो जाता है कि इसकी आयतें कुछ और नहीं बल्कि एक भूली हुई सच्चाई को याद दिलाने वाली हैं और यह कि अल्लाह “इस का अधिकार रखता है कि उससे डरा जाए और वह [क्षमा करने] के लिए पर्याप्त है।”

निष्कर्ष

सूरह मुद्दस्सिर की इस विवेचना से यह स्पष्ट हो जाता है कि अपने शास्त्रीय संदेश के अलावा, यह सूरह एक ऐसी आपदा की ओर इशारा करती है जो कोविड-19 के नाम से जानी जाएगी, जिसे सक़र-19 या अग्नि-19 भी कहा जा सकता है। इस सूरह और सूरह क़मर के संदर्भों से यह स्पष्ट होता है कि ‘सक़र’ को परम्परागत रूप से नर्क की आग समझा जाता है, जबकि इसकी बेहतर व्याख्या दुनिया में फैले उस संक्रमण की आग के रूप में संभव है जो कि कोरोना वाइरस की लगाई हुई है और जो अमेरिकी नेतृत्व में पनप रहे पूंजीवादी अन्याय के परिणामस्वरूप मानव जाति के लिए गंभीर है। यह तय है कि सक़र-19 वैश्विक आर्थिक प्रणाली को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा, जिसका मुख्य रूप से निशाना अमेरिकी का आधिपत्य हो सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि क़ुरआन के अध्याय 74 में सक़र-19 का उल्लेख एक वैश्विक और सार्वभौमिक आपदा के रूप में किया गया है, जिसकी प्रासंगिक अभिव्यक्ति इस सूरह की आयतों के अर्थ में वर्णित है। यह वास्तव में मानव समाज में सुधार का एक प्राकृतिक तरीक़ा है और इसे मानव इतिहास के महान परिवर्तन के रूप में लिया जा सकता है, जो कि अहंकारी और लोभी नेतृत्व पर भारी पड़ रहा है। इसे ईश्वरीय संकेतों के प्रति अपने दृष्टिकोण में संशोधन करने और पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा प्राकृतिक संसाधनों को हथियाने और अर्थव्यवस्थाओं को नियंत्रित करने के लिए ग़लत फैसलों और उसके लिए युद्ध और हिंसा से पीड़ित दुनिया में आर्थिक न्याय के नैतिक पहलू को आगे बढ़ाने के लिए मानव जाति के लिए एक अनुस्मारक के रूप में लिया जा सकता है।

[1] Dr. August Hirsch, Handbook of Geographical and Historical Pathology, vol. 1, Acute Infective Disease, trans. Charles Creighton, M.D. (2nd German ed. 1881; repr., London: New Sydenham Society, 1883), 508.

[2] https://19.org/blog/on-it-is-nineteen/

[3] https://www.etymonline.com/word/scar

[4]  https://www.livescience.com/46335-remains-of-ancient-egypt-epidemic-found.html

[5] https://books.google.co.in/books?id=vaxvDwAAQBAJ&pg=PT259&lpg=PT259&dq=What+happened+ to+you+in+ aqar?&source=bl&ots=kngO3XmTzx&sig=ACfU3U1JG5k_HLQbkouBe9DrPK7-DaXedQ&hl=en&sa=X&ved=2ahUKEwiawYb948rpAhW1wzgGHa84AioQ6AEwFnoECA0QAQ#v=onepage&q=What%20happened%20to%20you%20in%20Saqar%3F&f=false

[6] https://www.timesnownews.com/health/article/coronavirus-symptoms-tingling-pain-in-your-hands-could-be-a-warning-sign-of-covid/593621

[7] https://angelnumber.org/what-does-the-number-19-mean-in-the-bible/

[8] https://sites.google.com/site/evidenceofgod/math-miracle/19/bible-code-vs-quran-code

[9] https://www.express.co.uk/news/weird/1258745/Coronavirus-Bible-virus-punishment-God-Christian-persecution-COVID-19

[10] https://ne-np.facebook.com/CTMagazine/posts/10158318947285421

दिव्य मार्ग की पहचान

दिव्य मार्ग की पहचान
डॉ अब्दुल रशीद अगवान

मनुष्यों के लिए किसी जीवन-पद्धति पर विश्वास, अनुसरण और व्यवहार बहुत महत्वपूर्ण हैं। यह उन्हें जीवन का लक्ष्य और उद्देश्य देती है और उनके जीवन को सकारात्मक तरीक़े से बदल देती है। हालाँकि, मानव समाज में यह विवाद पाया जाता है कि जीवन-पद्धति क्या और कैसी होनी चाहिए?  इस संबंध में लोगों के दो प्रमुख समूह हैं। एक मनुष्य को जीवन का एक वांछित तरीका प्रदान करने के लिए एक अलौकिक स्रोत में विश्वास करता है तो दूसरा मानता है कि ऐसा कोई भी स्रोत संभावित नहीं है और मनुष्य को इस संसार में रहने के अपने तरीक़े ख़ुद खोजने होंगे। नतीजतन, मानव आबादी को मोटे तौर पर धार्मिक और गैर-धार्मिक आबादी में विभाजित किया गया है। प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार, दुनिया में 86% लोग रिलीजियस आबादी के रूप में धर्म के किसी न किसी रूप के अनुयायी होते हैं और बाकी लोग असम्बद्ध की श्रेणी में आते हैं यानी वे किसी रिलीजन को अपने जीवन के लिए आवश्यक नहीं मानते। ज़ाहिर है, मानव जाति के एक विशाल बहुमत के लिए, ‘धर्म’ प्रेरणा और आचार संहिता के स्रोत के रूप में महत्वपूर्ण है। यहां एक बड़ा प्रश्नचिन्ह यह है कि क्या रिलीजन और धर्म एक ही धारणा के दो नाम हैं?

ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने रिलीजन को कुछ अलौकिक शक्ति या शक्तियों (जैसे कि एक ईश्वर या कई देवताओं) पर विश्वास या मान्यता के रूप में परिभाषित किया है जो आमतौर पर आज्ञाकारिता, श्रद्धा और पूजा में प्रकट होता है; इस तरह कि एक विश्वास से पैदा हुआ तरीक़ा जीवन की एक आचार संहिता और आध्यात्मिक या भौतिक सुधार प्राप्त करने के साधन के रूप में हो। शब्द ‘रिलीजन’ मौलिक मान्यताओं, रीति-रिवाजों और संस्कारों, इतिहास, मतों और लोगों की सांस्कृतिक परंपराओं के एक सामान्य समावेश को दर्शाता है। जबकि ‘धर्म’ सामान्य रूप से कुछ मूलभूत सिद्धांतों और बुनियादी मूल्यों पर आधारित होता है, मगर व्यवहार में वह अपने अनुयायियों के जीवन में उत्पन्न होने वाले परिवर्तनों और सोच के विरोधाभास से काफी हद तक प्रभावित हो जाता है। मौलिक सिद्धांतों और बुनियादी मूल्यों पर ज़ोर देने से धार्मिक वर्गों को क़रीब लाया जा सकता है और उनमें परस्पर सहयोग पैदा किया जा सकता है, जबकि उनके ऊपरी स्वरूप पर ज़ोर देने से धर्म के नाम पर लोगों में विभाजन और संघर्ष हो सकता है। इस विचार को दो शब्दों, ‘दीन’ और ‘धर्म’ के तुलनात्मक विश्लेषण से समझा जा सकता है।

परंपरागत रूप से ‘दीन’ शब्द का यहूदी, ईसाई और मुसलमानों सहित सभी सेमिटिक लोगों के लिए महत्व है, जबकि धर्म शब्द का उपयोग अन्य परंपराओं जैसे कि ब्राह्मणी, बौद्ध, सिख, जैन, आदि में मौलिक है। यह विश्लेषण करना दिलचस्प होगा कि ‘जीवन के रास्ते’ को सही अर्थ देने में ये दोनों शब्द किस तरह महत्वपूर्ण हैं।

इस्लामी परंपराओं में ‘दीन’ शब्द अधिक लोकप्रिय है। हालाँकि, बाइबिल की विरासत में इसका ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व भी है। इस शब्द की व्युत्पत्ति इसके हिब्रू समानांतर ‘दीन’ या अरामी पर्यायवाची शब्द ‘दीना’ से मानी जाती है। इस शब्द का हिब्रू भाषा में अर्थ “कानून” या “निर्णय” है। यह “शक्ति” और “व्यवस्था” को भी संदर्भित करता है। प्राचीन यहूदी क़ानूनी प्रणाली ‘बेट दीन’ के रूप में जिसे “निर्णय का घर” कहा जाता है, पर आधारित है। कुछ विद्वानों ने यह भी सुझाव दिया है कि इस शब्द की उत्पत्ति जोरोस्ट्रियन शब्द ‘दईना’ से हुई है। द इनसिक्लापीडिया ऑफ इस्लाम में ‘दीन’ पर अपने नोट में, लुई गार्डेट ने “परिणाम, ऋण, दायित्व, प्रथा और दिशा” जैसी अवधारणाओं के लिए ‘दीन’ शब्द के हेब्रिक और अरबी निहितार्थ का वर्णन किया है, जिसके कारण उन्होंने कुरान के वाक्यांश ‘यौमुल दीन’ का अनुवाद यूं किया है, “वह दिन जब ईश्वर प्रत्येक मनुष्य को एक दिशा देता है।”

‘दीन’ शब्द क़ुरान में 98 बार आया है। इस शब्द का सटीक अनुवाद मुमकिन नहीं है और रिलीजन के रूप में इसकी व्याख्या केवल भ्रम पैदा करती है और विवाद को आमंत्रित करती है। लुग़त-उल-कुरान में, गुलाम अहमद परवेज ने कहा है कि यह शब्द आस्था, प्रणाली, शक्ति, वर्चस्व, आरोहण, संप्रभुता या आधिपत्य, प्रभुत्व, कानून, संविधान, निपुणता, सरकार, क्षेत्र, निर्णय, जैसे संकल्पनाओं को दर्शाता है। निश्चित परिणाम, इनाम और सजा भी इसकी धारणा में शामिल हैं। ऑक्सफोर्ड इस्लामिक स्टडीज ऑनलाइन के अनुसार, यह शब्द “आदत,” “रास्ता”, “हिसाब”, “आज्ञाकारिता,” “निर्णय,” और “इनाम” के लिए अरबी शब्दों का मूल है।

क़ुरान केवल एकवचन में ‘दीन’ शब्द का उपयोग करता है। इसका बहुवचन उपयोग ‘अदयान’ एक कृत्रिम शब्द है। केवल एक स्थान पर क़ुरान कहता है, “मेरे लिए मेरा दीन और तुम्हारे लिए, तुम्हारा दीन ।” यहां भी इसका उपयोग एकवचन में ही है और इसे एक ही अवधारणा की दो अलग-अलग समझ के रूप में लिया जा सकता है। क़ुरान सूचित करता है कि ईश्वर के लिए पसंदीदा ‘दीन’ इस्लाम है। यहां, कुछ मुस्लिम और ग़ैर-मुस्लिम विद्वान सोचने में यह ग़लती कर सकते हैं कि इस्लाम के नाम पर जो कुछ भी कहा जाता है और मौजूद है वह इस्लाम है। जबकि सच्चाई वही है जो कि क़ुरान बयान करता है और हदीस जिसकी व्याख्या करती है। क़ुरान शुरू से ही इस बात पर ज़ोर देता है कि अल्लाह एक सार्वभौमिक सत्ता है, रब-उल-अलमीन है, और यह कि इस्लाम उसी दीन का प्रतिनिधित्व करता है जो कि आदम के आगमन से जारी होकर आज भी सनातन रूप में मौजूद है और पूरे प्रकट दिव्य ज्ञान का सार है। क़ुरान की आयत 2:4 में यह आवश्यक ठहराया गया है कि इस पुस्तक से मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए यह ज़रूरी है कि पैगंबर हज़रत मुहम्मद (स.) से पहले जो कुछ भी दिव्य ज्ञान संसार में आया था उस पर भी आस्था ज़रूरी है। क़ुरान (2:136) ऐसे आस्थावानों को सलाह देता है कि वे कहें, “जो कुछ अब्राहम और इश्माएल और इसहाक और जैकब और उनके वंशजों को और मूसा और ईसा को और (अन्य) दूतों को उनके प्रभु ने (दिव्य मार्ग के रूप में) दिया था हम उस पर आस्था रखते हैं। हम उनमें से किसी के बीच कोई अंतर नहीं करते हैं, और हम आज्ञाकारी (मुस्लिम) हैं।” इस प्रकार, क़ुरान दीन को नस्लवादी या संप्रदायवादी सोच के बजाय एक सार्वभौमिक विचार के रूप में प्रस्तुत करता है। क़ुरान सूचित करता है कि दीन इंसान के वास्तविक स्वभाव – फितरत – को प्रकट करता है।

जाने-माने इस्लामिक विद्वान फजलुर्रहमान मलिक का मत है कि दीन को “अनुसरणीय मार्ग” के रूप में लेना चाहिये। एक हदीस के कथन से दीन का अर्थ और अधिक स्पष्ट हो सकता है। अबू हुरैरा ने हज़रत मुहम्मद (स.) का यह कथन उद्वरित किया है, ”दीन बहुत आसान है और जो भी अपने दीन में किसी तरह की अति करेगा, वह उसे जारी नहीं रख सकेगा। इसलिए किसी को अतिवादी नहीं होना चाहिए, लेकिन पूर्णता के निकट होने की कोशिश करनी चाहिये…” (बुखारी 1: 2: 38)। वास्तव में, यह कथन क़ुरान में सीरात-ए-मुस्तकीम (सीधा रास्ता) या सवा-अस-सबील (समतल रास्ता) के रूप में दीन की अवधारणा की ही पुष्टी करता है। दीन की यह अवधारणा बौद्ध विश्वास के मध्य-मार्ग जैसे विचार से क़रीब नज़र आती है।

ब्राह्मणवादी परंपराओं में, धर्म को आम तौर पर एक प्राकृतिक व्यवहार के रूप में लिया जाता है जो कि धारण किया जाना चाहिए (धारयति इति धर्मः)। मगर यहां एक ग़लतफहमी यह पैदा होती है कि हर चीज़ जो मनुष्य धारण करता है वह धर्म है। वास्तविकता इसके उलट है। दर असल जब हम धर्म की अवधारणा को जगत की हर चीज़ पर लागू करते हैं तो देखते हैं कि संसार की हर चीज़ अपने अपने दायरे और स्वभाव के अनुसार काम कर रही है। इसे देख कर हम और चीज़ों की तरह धर्म को मनुष्य के आचरण से जोड़ देते हैं। संसार की हर चीज़ अपने स्वभाव से बंधी हुई है, मगर मनुष्य नहीं। उसका व्यवहार धर्म के अनुसार हो भी सकता और नहीं भी। इसलिए इस व्यवहार में धर्म है या नहीं इसे धर्म के कुछ लक्ष्णों द्वारा बेहतर समझा जा सकता है।

इन लक्ष्णों के रूप में धर्म को मनुस्मृति (6:91) में इस तरह परिभाषित किया गया है:

धृति: क्षमा दमोऽस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्‍यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्‌।।

अर्थात धृति (धैर्य), क्षमा, दम (आत्म-नियंत्रण), अस्तेय (ईमानदारी), शौच (स्वच्छता), इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रिय-नियंत्रण), धी (तर्क की भावना), विद्या, सत्य, अक्रोध (अपने क्रोध को नियंत्रित करने की क्षमता) ये धर्म के दस लक्षण हैं। य़ानी जिस धारणा य़ा व्यवहार में ये लक्षण न पाये जाएं वह धर्म ही नहीं है या जितना इनका प्रभाव पाया जाए है बस उतना ही धर्म है।

याज्ञवल्क्य स्मृति (1:122) में मनुस्मृति की सूची में अहिंसा, दान और शांति को जोड़ा गया है और उसमें से कुछ अन्य को छोड़कर 9 विशेषताएँ दी गई हैं। उनकी सूची इस प्रकार है:

अहिंसा सत्‍यमस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह:।
दानं दमो दया शान्‍ति: सर्वेषां धर्मसाधनम्‌।।

विदुर ने महाभारत में ईज्या (अनुष्ठान), स्वाध्याय (अध्ययन), दान (दान), तप (तपस्या), सत्य (सत्य), दया (दया), क्षेम (क्षमा) और अलभ (लालच) को धर्म के 8 भागों के रूप में उद्धृत किया। श्रीमद्भगवत में धर्म के कई गुणों का भी उल्लेख है जो उपर्युक्त गुणों में से अधिकांश को साझा करते हैं।

बौद्ध परंपरा में प्रासंगिक शब्द ‘धम्म’ है, जिसका अर्थ है आचार और ब्रह्मांड के प्राकृतिक क्रम को बनाए रखना। बौद्ध परंपरा में मध्यमार्ग को अत्यधिक महत्व दिया जाता है जो मानव जीवन में व्यवहार के चरम पर क़ाबू पाने के लिए आठ सम्यक विचारों से समझा जा सकता है। जैन परंपरा में, संस्कृत शब्द धर्म, जिसे प्राकृत धम्म भी कहा जाता है, का उपयोग किया जाता है। यह दो प्रकार के परस्पर संबंधित मानवीय आचरणों का प्रचार करता है, एक गृहस्थ के लिए और दूसरा तपस्वी के लिए। यह 10 मूल्यों पर ज़ोर देता है, जैसे कि सर्वोच्च क्षमा, सर्वोच्च विनम्रता, सर्वोच्च सरलता, सर्वोच्च सत्यता, सर्वोच्च शुद्धता, सर्वोच्च आत्म-संयम, सर्वोच्च तपस्या, सर्वोच्च त्याग, सर्वोच्च अनिच्छा और सर्वोच्च ब्रह्मचर्य।

यहां यह स्पष्ट है कि दीन और धर्म दोनों ही शब्द किसी भी समुदाय, संप्रदाय, राष्ट्र, लोक-समूह, देश, जाति, जनजाति, आदि के बजाय सही आस्था और उसके अनुसार कर्म को दर्शाते हैं। दीन या धर्म मनुष्य को जीवन में कुछ मूल्य-आधारित आचरण प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है। यह अपने आप में किसी विशेष वर्ग के लोगों से ख़ुद को नहीं जोड़ता है बल्कि एक निर्धारित आचार संहिता को दर्शाता है। लोग दीन या धर्म को तय नहीं करते हैं बल्कि दीन या धर्म स्वयं यह तय करता है कि कौन उसको मानता है और कौन नहीं। इस्लाम को मुसलमानों का धर्म या धर्म को हिंदू-धर्म मानना ग़लत है। दोनों शब्द, और इनके अन्य समानार्थी प्रकार, मानव व्यवहार में कुछ गुणों के समावेश पर ज़ोर देते हैं जो कि मानव जीवन को सार्थक और सामंजस्यपूर्ण बना सकते हैं। इस्लाम में ईश्वर को उसके कई गुणों जैसे कि रचनाकार, प्रशंसनीय, परम, दयालु, ज्ञानवान, न्यायप्रिय, क्षमाशील आदि के रूप में जाना जाता है और यह समझ में आता है कि मनुष्य को इन दिव्य गुणों को अपने जीवन में अपनाना चाहिए और उनके अनुसार अपने जीवन को ढालना चाहिए। इसी प्रकार, धर्म कुछ लोगों की एक विश्वास प्रणाली बनने के बजाय सभी मनुष्यों में कुछ स्वाभाविक गुणों पर ध्यान केंद्रित करता है। ज़ाहिर है कि दीन और धर्म को यह तय करना चाहिए कि सच्चा अनुयायी कौन है न कि इसके विपरीत हो। दीन या धर्म की व्याख्या, अनुष्ठान, इतिहास, महान अनुयायियों के कथन, संस्कृति, आदि से संबंधित पहचानों से लोगों के किसी समूह को किसी ख़ास दीन या धर्म का अनुयायी होने का दावा किया जाता है,  हालांकि उन्हें दीन या धर्म को समझने के लिए मानवीय प्रयासों के रूप में माना जाना चाहिये, मौलिक नहीं। दीन और धर्म दोनों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला रिलीजन शब्द अपने वास्तविक स्वरूप के साथ असंगत है। इसी तरह इन दोनों शब्दों को बहुवचन में इस्तेमाल भी ग़लत है। रिलीजियन, जिसे अरबी भाषा में मज़हब कहा जाता है, धार्मिक नाम से जुड़ी किसी भी चीज़ को शामिल करता है, जो कि दीन या धर्म के सही अर्थों के विपरीत भी हो सकती है। इसके मद्देनजर, अलग-अलग वर्गों में दीन या धर्म के नाम पर प्रचलित चीज़ों की तुलना करने के बजाय बेहतर समझ के लिए दीन या धर्म की विभिन्न मूल अवधारणाओं की तुलना एक वांछित दृष्टिकोण माना जाना चाहिए। वास्तव में इसी तरह हम दीन या धर्म को सही तौर पर पहचान सकते हैं और धर्म के नाम पर होने वाले विवादों को कम कर सकते हैं।

Animal Sacrifice: One of the oldest and most universal traditions

Dr Abdul Rashid Agwan

Eid Al-Azha is widely known as a celebration of animal sacrifice, but it is exactly not so.  The day also denotes completion of Haj, issue of the first charter of human rights in the Farewell Sermon of Prophet Muhammad, a ritual assembly of people from all races and nations at one place while symbolizing human unity, remembrance of the epitome of sacrifice in Prophet Ibrahim the arch-father of the Semitic faiths, and continuity of certain traditions that began from the first man Adam and his family in antiquity and universally followed by mankind across many millennia thereafter.

The story of individual sacrifices of the two sons of Adam, Habil (Abel) and Kabil (Cain), has been described in the Bible (Genesis, 3:21, 4:4) and the Quran (5-27-31). The Kapil Smriti (Verse 1) presents its Puranic version wherein these sons of ‘Manu’ are named as Shaunak and Kapil. The place of the first recorded animal sacrifice is the same, Mina.

The animal domestication that began around 12000 years before present, with sheep and goat, also led besides other purposes to the tradition of offering animals for common festivity and fulfilling a religious obligation. Some of the earliest archeological evidence suggesting animal sacrifice comes from the ancient Egypt. The oldest Egyptian burial sites containing animal remains have been excavated from the Badari culture of Upper Egypt that bloomed between 4400 and 4000 BC. Horse sacrifice for waging war had also been a prevalent tradition in ancient times, particularly among the Indo-European speakers. Chariot burial was also an ancient ritual in which whole chariot was buried with or without horses, the earliest such practice was found vogue in the Sintashta-Perovka culture of Russia around 2000 BC.

According to Wikipedia, the qorban is any of a variety of sacrificial offerings by Jews as described and commanded in the Torah. The most common usages are animal sacrifice (zevah), comprising zevah shelamim (the peace offering) and olah (the holocaust or burnt offering). A qorban was an animal sacrifice, such as of a bull, sheep, goat or a dove that underwent shechita (Jewish ritual slaughter).

The New Testament informs about the sacrifice of two doves by the parents of Jesus (Luke 2:24). The Christ’s crucifixion has largely been deemed in Christianity as a substitutionary punishment for all of humanity’s sins and hence no need of animal sacrifice further. Still, a few Christian sections have carried on the practice, especially on the occasion of Easter. Some villages in Greece sacrifice animals to Orthodox saints while observing the festival called kourbania. Animal sacrifice was instituted in the Armenian Church, Twewhedo Church of Ethiopia and Eritrea, Mayan Folk Catholicism, Church of Jesus Christ of Latter Day Saints and in some other communities. Though animal sacrifice is not ubiquitous among Christians but this does not restrict them to opt for a non-vegetarian food.

The Indus civilization had the prevalence of ritual of water-buffalo sacrifice, which then spread to other parts of India. A blog on harrapa.com informs: “Early Harappan cultures started moving toward the east and south in about 3000 BCE, and later waves of influence in these same directions came from the Indus civilization. That the Harappan water-buffalo cult had reached peninsular India by the late Harappan on Chalcolithic times is suggested by the large bronze sculpture of water buffalo discovered in 1974 in a hoard at Daimabad, the southernmost Indus site in Maharashtra. Throughout south India, until relatively recently, village goddesses have been worshipped through water-buffalo sacrifices. The goddesses have been associated with a male deity call the buffalo king, represented by a wooden post or a pillar made of stone, or by the pipal tree.”

The followers of Shaktism observe animal sacrifice as an integral part of their faith, which is mainly prevalent in West Bengal and Assam and some hilly parts of India. Animal sacrifice on a large scale came to light in April 2016 at a remote tribal habitation in Nalgonda district. Reportedly, tribal people slaughtered over 100 bulls at that time to appease their goddess Kankali Bhavani, locally called Ankalamma. According to Wikipedia, some warrior communities of Rajasthan worship their weapons and horses on Navratri. Though now redundant, they formerly offered a sacrifice of a goat to Kuldevi – a practice still visible in some places. There are temples in Assam and West Bengal and also in Nepal where goats, chickens and sometimes water buffalos are sacrificed as a ritual. The Kalaki Purana distinguishes bali (sacrifice) and mahabali (great sacrifice), for the ritual killing of goat and elephant, respectively. Manusmriti (5:22) prescribes sacrificial rituals. Ashvamedha ritual has been described in Yajurveda, Ramayana and Mahabharata as an ancient practice. A popular ritual of North Malabar region in Kerala is the blood offering to Theyyam gods. One of the largest animal sacrifices in Nepal occurs during a three-day-long Gadhimai festival, which was banned by the Nepal government in 2015.

Animal sacrifice is largely practiced in traditional African and Afro-American religions. There are two landmark Supreme Court judgments in America, which uphold the right of certain minorities there to practice the ritual of animal sacrifice.

Among Sikhs, only Nihang sect performs animal sacrifice. The religions that completely prohibit animal sacrifice are Buddhism and Jainism. However, Sikhs and Buddhists are free to choose their dietary menu. It is only Jainism that does not allow non-vegetarian life the least.

Animal sacrifice takes a communal turn in India around Eid Al-Azha. Three sections of activists become vocal and sometimes aggressive in criticizing and blocking the practice of animal sacrifice on the occasion of Eid, as performed worldwide by Muslims. These are the champions of Ahimsa, animal rights and cow protectionism. However, their arguments and agitations are largely on flimsy and hypocritical grounds.

The adherents of non-violence plead that animal sacrifice is not acceptable being antithetical to life.  Their sheer ignorance is exposed when they deny the fact that life is not the fundamental quality of animals only. It is also precious to plants and microorganisms.  When the trees are felled, crops are cut and vegetables are procured, a lot of living things suffer for the human benefit. When antibiotics are taken, may be in the form of a herbal syrup, billions of bacteria, viruses and other life forms harmful to men, got killed.  When men eat curd or drink water or cook food, billions of life forms are consumed in the process. In the flush of commodes and washing of floors billions of life forms are destroyed. The first experimental scientist of modern age, J.C. Bose, had been ignored in India only for his research that plants are also living beings.  Some recent studies and experiments have established that plants not only have feelings about happiness and sufferings but they also communicate and share resources with each other through a chemical medium. Some pseudo-environmentalist may talk in very convincing scientific jargons but they largely ignore the principles of energy entrapment, food chain and food pyramid as integral to an ecosystem. They ignore that humans are biologically omnivorous.

The animal right workers claim that killing animals for food and rituals is not a good practice. However, their hollow claims are exposed when they hardly speak and work for the liberation of a variety of domesticated animals and extraction of milk from them, which is not only a non-vegetarian product in itself but also a visible injustice to young lactating animals.  If rearing of monkey by a Madari is a violation of animal right, how the rearing of dogs in elite homes is a charity?

On this occasion of Eid-al-Azha, there should be a social environment of mutual respect of upholders of different views. Muslims should take care that their practice should not affect the feelings of those who are opposed to animal sacrifice, by confining it within their own homes and localities and not displaying pictures of animals and their blood on social media. After all it is a religious obligation and not a matter of ostentation. They should also treat vegetarianism as another category of minority whose rights must be respected by the majority of the nonvegans. In a world of 7 billion plus people, vegans comprise only 375 million of all, i.e. just 5%.

Cow vigilantes are generally the extortionist and political groups which violently attack animal traders for obvious reasons. Their concern for cows could not be seen in many cases when thousands of cows died at private and government run cow shelters. They hardly take interest in the welfare of cows stranded on busy roads and crowded markets, which often die of accidents or diseases.

Those who are opposed to non-vegetarian life style can preach their ideas without violence, both physical and mental. In fact, violence will only undermine their cause in the long run. One can hardly propagate non-violence by violent means. This will only increase violence in society and nothing else.

Coming back to the origin of sacrifice, can Muslims opt in the present circumstances of communal hatred and uncontrolled public violence to take the line chosen by Abel against his brother? He says (Quran 5:29), “If you do stretch your hand against me to kill me, I shall never stretch my hand against you to kill you: for I fear Allah, the Lord of all the worlds.” The lesson which can be drawn by Indian Muslims from the story of the first sacrifice is that they should not take recourse to counter-violence. Rather, they should go on convincing people why the Muslims’ viewpoint on the animal sacrifice is justified. In case of need, they should at the most take a legal course.