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दिव्य मार्ग की पहचान

दिव्य मार्ग की पहचान
डॉ अब्दुल रशीद अगवान

मनुष्यों के लिए किसी जीवन-पद्धति पर विश्वास, अनुसरण और व्यवहार बहुत महत्वपूर्ण हैं। यह उन्हें जीवन का लक्ष्य और उद्देश्य देती है और उनके जीवन को सकारात्मक तरीक़े से बदल देती है। हालाँकि, मानव समाज में यह विवाद पाया जाता है कि जीवन-पद्धति क्या और कैसी होनी चाहिए?  इस संबंध में लोगों के दो प्रमुख समूह हैं। एक मनुष्य को जीवन का एक वांछित तरीका प्रदान करने के लिए एक अलौकिक स्रोत में विश्वास करता है तो दूसरा मानता है कि ऐसा कोई भी स्रोत संभावित नहीं है और मनुष्य को इस संसार में रहने के अपने तरीक़े ख़ुद खोजने होंगे। नतीजतन, मानव आबादी को मोटे तौर पर धार्मिक और गैर-धार्मिक आबादी में विभाजित किया गया है। प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार, दुनिया में 86% लोग रिलीजियस आबादी के रूप में धर्म के किसी न किसी रूप के अनुयायी होते हैं और बाकी लोग असम्बद्ध की श्रेणी में आते हैं यानी वे किसी रिलीजन को अपने जीवन के लिए आवश्यक नहीं मानते। ज़ाहिर है, मानव जाति के एक विशाल बहुमत के लिए, ‘धर्म’ प्रेरणा और आचार संहिता के स्रोत के रूप में महत्वपूर्ण है। यहां एक बड़ा प्रश्नचिन्ह यह है कि क्या रिलीजन और धर्म एक ही धारणा के दो नाम हैं?

ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने रिलीजन को कुछ अलौकिक शक्ति या शक्तियों (जैसे कि एक ईश्वर या कई देवताओं) पर विश्वास या मान्यता के रूप में परिभाषित किया है जो आमतौर पर आज्ञाकारिता, श्रद्धा और पूजा में प्रकट होता है; इस तरह कि एक विश्वास से पैदा हुआ तरीक़ा जीवन की एक आचार संहिता और आध्यात्मिक या भौतिक सुधार प्राप्त करने के साधन के रूप में हो। शब्द ‘रिलीजन’ मौलिक मान्यताओं, रीति-रिवाजों और संस्कारों, इतिहास, मतों और लोगों की सांस्कृतिक परंपराओं के एक सामान्य समावेश को दर्शाता है। जबकि ‘धर्म’ सामान्य रूप से कुछ मूलभूत सिद्धांतों और बुनियादी मूल्यों पर आधारित होता है, मगर व्यवहार में वह अपने अनुयायियों के जीवन में उत्पन्न होने वाले परिवर्तनों और सोच के विरोधाभास से काफी हद तक प्रभावित हो जाता है। मौलिक सिद्धांतों और बुनियादी मूल्यों पर ज़ोर देने से धार्मिक वर्गों को क़रीब लाया जा सकता है और उनमें परस्पर सहयोग पैदा किया जा सकता है, जबकि उनके ऊपरी स्वरूप पर ज़ोर देने से धर्म के नाम पर लोगों में विभाजन और संघर्ष हो सकता है। इस विचार को दो शब्दों, ‘दीन’ और ‘धर्म’ के तुलनात्मक विश्लेषण से समझा जा सकता है।

परंपरागत रूप से ‘दीन’ शब्द का यहूदी, ईसाई और मुसलमानों सहित सभी सेमिटिक लोगों के लिए महत्व है, जबकि धर्म शब्द का उपयोग अन्य परंपराओं जैसे कि ब्राह्मणी, बौद्ध, सिख, जैन, आदि में मौलिक है। यह विश्लेषण करना दिलचस्प होगा कि ‘जीवन के रास्ते’ को सही अर्थ देने में ये दोनों शब्द किस तरह महत्वपूर्ण हैं।

इस्लामी परंपराओं में ‘दीन’ शब्द अधिक लोकप्रिय है। हालाँकि, बाइबिल की विरासत में इसका ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व भी है। इस शब्द की व्युत्पत्ति इसके हिब्रू समानांतर ‘दीन’ या अरामी पर्यायवाची शब्द ‘दीना’ से मानी जाती है। इस शब्द का हिब्रू भाषा में अर्थ “कानून” या “निर्णय” है। यह “शक्ति” और “व्यवस्था” को भी संदर्भित करता है। प्राचीन यहूदी क़ानूनी प्रणाली ‘बेट दीन’ के रूप में जिसे “निर्णय का घर” कहा जाता है, पर आधारित है। कुछ विद्वानों ने यह भी सुझाव दिया है कि इस शब्द की उत्पत्ति जोरोस्ट्रियन शब्द ‘दईना’ से हुई है। द इनसिक्लापीडिया ऑफ इस्लाम में ‘दीन’ पर अपने नोट में, लुई गार्डेट ने “परिणाम, ऋण, दायित्व, प्रथा और दिशा” जैसी अवधारणाओं के लिए ‘दीन’ शब्द के हेब्रिक और अरबी निहितार्थ का वर्णन किया है, जिसके कारण उन्होंने कुरान के वाक्यांश ‘यौमुल दीन’ का अनुवाद यूं किया है, “वह दिन जब ईश्वर प्रत्येक मनुष्य को एक दिशा देता है।”

‘दीन’ शब्द क़ुरान में 98 बार आया है। इस शब्द का सटीक अनुवाद मुमकिन नहीं है और रिलीजन के रूप में इसकी व्याख्या केवल भ्रम पैदा करती है और विवाद को आमंत्रित करती है। लुग़त-उल-कुरान में, गुलाम अहमद परवेज ने कहा है कि यह शब्द आस्था, प्रणाली, शक्ति, वर्चस्व, आरोहण, संप्रभुता या आधिपत्य, प्रभुत्व, कानून, संविधान, निपुणता, सरकार, क्षेत्र, निर्णय, जैसे संकल्पनाओं को दर्शाता है। निश्चित परिणाम, इनाम और सजा भी इसकी धारणा में शामिल हैं। ऑक्सफोर्ड इस्लामिक स्टडीज ऑनलाइन के अनुसार, यह शब्द “आदत,” “रास्ता”, “हिसाब”, “आज्ञाकारिता,” “निर्णय,” और “इनाम” के लिए अरबी शब्दों का मूल है।

क़ुरान केवल एकवचन में ‘दीन’ शब्द का उपयोग करता है। इसका बहुवचन उपयोग ‘अदयान’ एक कृत्रिम शब्द है। केवल एक स्थान पर क़ुरान कहता है, “मेरे लिए मेरा दीन और तुम्हारे लिए, तुम्हारा दीन ।” यहां भी इसका उपयोग एकवचन में ही है और इसे एक ही अवधारणा की दो अलग-अलग समझ के रूप में लिया जा सकता है। क़ुरान सूचित करता है कि ईश्वर के लिए पसंदीदा ‘दीन’ इस्लाम है। यहां, कुछ मुस्लिम और ग़ैर-मुस्लिम विद्वान सोचने में यह ग़लती कर सकते हैं कि इस्लाम के नाम पर जो कुछ भी कहा जाता है और मौजूद है वह इस्लाम है। जबकि सच्चाई वही है जो कि क़ुरान बयान करता है और हदीस जिसकी व्याख्या करती है। क़ुरान शुरू से ही इस बात पर ज़ोर देता है कि अल्लाह एक सार्वभौमिक सत्ता है, रब-उल-अलमीन है, और यह कि इस्लाम उसी दीन का प्रतिनिधित्व करता है जो कि आदम के आगमन से जारी होकर आज भी सनातन रूप में मौजूद है और पूरे प्रकट दिव्य ज्ञान का सार है। क़ुरान की आयत 2:4 में यह आवश्यक ठहराया गया है कि इस पुस्तक से मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए यह ज़रूरी है कि पैगंबर हज़रत मुहम्मद (स.) से पहले जो कुछ भी दिव्य ज्ञान संसार में आया था उस पर भी आस्था ज़रूरी है। क़ुरान (2:136) ऐसे आस्थावानों को सलाह देता है कि वे कहें, “जो कुछ अब्राहम और इश्माएल और इसहाक और जैकब और उनके वंशजों को और मूसा और ईसा को और (अन्य) दूतों को उनके प्रभु ने (दिव्य मार्ग के रूप में) दिया था हम उस पर आस्था रखते हैं। हम उनमें से किसी के बीच कोई अंतर नहीं करते हैं, और हम आज्ञाकारी (मुस्लिम) हैं।” इस प्रकार, क़ुरान दीन को नस्लवादी या संप्रदायवादी सोच के बजाय एक सार्वभौमिक विचार के रूप में प्रस्तुत करता है। क़ुरान सूचित करता है कि दीन इंसान के वास्तविक स्वभाव – फितरत – को प्रकट करता है।

जाने-माने इस्लामिक विद्वान फजलुर्रहमान मलिक का मत है कि दीन को “अनुसरणीय मार्ग” के रूप में लेना चाहिये। एक हदीस के कथन से दीन का अर्थ और अधिक स्पष्ट हो सकता है। अबू हुरैरा ने हज़रत मुहम्मद (स.) का यह कथन उद्वरित किया है, ”दीन बहुत आसान है और जो भी अपने दीन में किसी तरह की अति करेगा, वह उसे जारी नहीं रख सकेगा। इसलिए किसी को अतिवादी नहीं होना चाहिए, लेकिन पूर्णता के निकट होने की कोशिश करनी चाहिये…” (बुखारी 1: 2: 38)। वास्तव में, यह कथन क़ुरान में सीरात-ए-मुस्तकीम (सीधा रास्ता) या सवा-अस-सबील (समतल रास्ता) के रूप में दीन की अवधारणा की ही पुष्टी करता है। दीन की यह अवधारणा बौद्ध विश्वास के मध्य-मार्ग जैसे विचार से क़रीब नज़र आती है।

ब्राह्मणवादी परंपराओं में, धर्म को आम तौर पर एक प्राकृतिक व्यवहार के रूप में लिया जाता है जो कि धारण किया जाना चाहिए (धारयति इति धर्मः)। मगर यहां एक ग़लतफहमी यह पैदा होती है कि हर चीज़ जो मनुष्य धारण करता है वह धर्म है। वास्तविकता इसके उलट है। दर असल जब हम धर्म की अवधारणा को जगत की हर चीज़ पर लागू करते हैं तो देखते हैं कि संसार की हर चीज़ अपने अपने दायरे और स्वभाव के अनुसार काम कर रही है। इसे देख कर हम और चीज़ों की तरह धर्म को मनुष्य के आचरण से जोड़ देते हैं। संसार की हर चीज़ अपने स्वभाव से बंधी हुई है, मगर मनुष्य नहीं। उसका व्यवहार धर्म के अनुसार हो भी सकता और नहीं भी। इसलिए इस व्यवहार में धर्म है या नहीं इसे धर्म के कुछ लक्ष्णों द्वारा बेहतर समझा जा सकता है।

इन लक्ष्णों के रूप में धर्म को मनुस्मृति (6:91) में इस तरह परिभाषित किया गया है:

धृति: क्षमा दमोऽस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्‍यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्‌।।

अर्थात धृति (धैर्य), क्षमा, दम (आत्म-नियंत्रण), अस्तेय (ईमानदारी), शौच (स्वच्छता), इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रिय-नियंत्रण), धी (तर्क की भावना), विद्या, सत्य, अक्रोध (अपने क्रोध को नियंत्रित करने की क्षमता) ये धर्म के दस लक्षण हैं। य़ानी जिस धारणा य़ा व्यवहार में ये लक्षण न पाये जाएं वह धर्म ही नहीं है या जितना इनका प्रभाव पाया जाए है बस उतना ही धर्म है।

याज्ञवल्क्य स्मृति (1:122) में मनुस्मृति की सूची में अहिंसा, दान और शांति को जोड़ा गया है और उसमें से कुछ अन्य को छोड़कर 9 विशेषताएँ दी गई हैं। उनकी सूची इस प्रकार है:

अहिंसा सत्‍यमस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह:।
दानं दमो दया शान्‍ति: सर्वेषां धर्मसाधनम्‌।।

विदुर ने महाभारत में ईज्या (अनुष्ठान), स्वाध्याय (अध्ययन), दान (दान), तप (तपस्या), सत्य (सत्य), दया (दया), क्षेम (क्षमा) और अलभ (लालच) को धर्म के 8 भागों के रूप में उद्धृत किया। श्रीमद्भगवत में धर्म के कई गुणों का भी उल्लेख है जो उपर्युक्त गुणों में से अधिकांश को साझा करते हैं।

बौद्ध परंपरा में प्रासंगिक शब्द ‘धम्म’ है, जिसका अर्थ है आचार और ब्रह्मांड के प्राकृतिक क्रम को बनाए रखना। बौद्ध परंपरा में मध्यमार्ग को अत्यधिक महत्व दिया जाता है जो मानव जीवन में व्यवहार के चरम पर क़ाबू पाने के लिए आठ सम्यक विचारों से समझा जा सकता है। जैन परंपरा में, संस्कृत शब्द धर्म, जिसे प्राकृत धम्म भी कहा जाता है, का उपयोग किया जाता है। यह दो प्रकार के परस्पर संबंधित मानवीय आचरणों का प्रचार करता है, एक गृहस्थ के लिए और दूसरा तपस्वी के लिए। यह 10 मूल्यों पर ज़ोर देता है, जैसे कि सर्वोच्च क्षमा, सर्वोच्च विनम्रता, सर्वोच्च सरलता, सर्वोच्च सत्यता, सर्वोच्च शुद्धता, सर्वोच्च आत्म-संयम, सर्वोच्च तपस्या, सर्वोच्च त्याग, सर्वोच्च अनिच्छा और सर्वोच्च ब्रह्मचर्य।

यहां यह स्पष्ट है कि दीन और धर्म दोनों ही शब्द किसी भी समुदाय, संप्रदाय, राष्ट्र, लोक-समूह, देश, जाति, जनजाति, आदि के बजाय सही आस्था और उसके अनुसार कर्म को दर्शाते हैं। दीन या धर्म मनुष्य को जीवन में कुछ मूल्य-आधारित आचरण प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है। यह अपने आप में किसी विशेष वर्ग के लोगों से ख़ुद को नहीं जोड़ता है बल्कि एक निर्धारित आचार संहिता को दर्शाता है। लोग दीन या धर्म को तय नहीं करते हैं बल्कि दीन या धर्म स्वयं यह तय करता है कि कौन उसको मानता है और कौन नहीं। इस्लाम को मुसलमानों का धर्म या धर्म को हिंदू-धर्म मानना ग़लत है। दोनों शब्द, और इनके अन्य समानार्थी प्रकार, मानव व्यवहार में कुछ गुणों के समावेश पर ज़ोर देते हैं जो कि मानव जीवन को सार्थक और सामंजस्यपूर्ण बना सकते हैं। इस्लाम में ईश्वर को उसके कई गुणों जैसे कि रचनाकार, प्रशंसनीय, परम, दयालु, ज्ञानवान, न्यायप्रिय, क्षमाशील आदि के रूप में जाना जाता है और यह समझ में आता है कि मनुष्य को इन दिव्य गुणों को अपने जीवन में अपनाना चाहिए और उनके अनुसार अपने जीवन को ढालना चाहिए। इसी प्रकार, धर्म कुछ लोगों की एक विश्वास प्रणाली बनने के बजाय सभी मनुष्यों में कुछ स्वाभाविक गुणों पर ध्यान केंद्रित करता है। ज़ाहिर है कि दीन और धर्म को यह तय करना चाहिए कि सच्चा अनुयायी कौन है न कि इसके विपरीत हो। दीन या धर्म की व्याख्या, अनुष्ठान, इतिहास, महान अनुयायियों के कथन, संस्कृति, आदि से संबंधित पहचानों से लोगों के किसी समूह को किसी ख़ास दीन या धर्म का अनुयायी होने का दावा किया जाता है,  हालांकि उन्हें दीन या धर्म को समझने के लिए मानवीय प्रयासों के रूप में माना जाना चाहिये, मौलिक नहीं। दीन और धर्म दोनों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला रिलीजन शब्द अपने वास्तविक स्वरूप के साथ असंगत है। इसी तरह इन दोनों शब्दों को बहुवचन में इस्तेमाल भी ग़लत है। रिलीजियन, जिसे अरबी भाषा में मज़हब कहा जाता है, धार्मिक नाम से जुड़ी किसी भी चीज़ को शामिल करता है, जो कि दीन या धर्म के सही अर्थों के विपरीत भी हो सकती है। इसके मद्देनजर, अलग-अलग वर्गों में दीन या धर्म के नाम पर प्रचलित चीज़ों की तुलना करने के बजाय बेहतर समझ के लिए दीन या धर्म की विभिन्न मूल अवधारणाओं की तुलना एक वांछित दृष्टिकोण माना जाना चाहिए। वास्तव में इसी तरह हम दीन या धर्म को सही तौर पर पहचान सकते हैं और धर्म के नाम पर होने वाले विवादों को कम कर सकते हैं।